Friday, July 04, 2008

मैं चाहता हूँ

मैं चाहता हूँ, फ़िर से...

- ढेर सारी कॉमिक्स पढना...
- दोस्तों के साथ खेलना...
- बारीश में भीगना...
- कागज़ की नाव बनाकर बहते हुये पानी में तैराना...
- सायकल पर स्टंट्स करना...
- सायकल खोल-खाल कर फ़िर से कसना...
- खुब खुब फ़ुटबाल खेलना...
- किसी पहाड़ पर चढना...
- खुब सारा तैरना...
- रेत में घरोंदे बनाना...
- पैराशुट बना कर उडाना...
- चित्रकारी करना...
- मिट्टी से मुर्तियाँ बनाना...
- गत्ते से घर बनाना...
- तार-मोटर वगैरह जोड कर सर्किट-मॉडल्स बनाना...
- दशहरे के रावण का पुतला बनाना...
- एल्युमिनियम के तार को मोड़ कर मॉडल्स बनाना...
- गुलेल बनाना...
- खिडकियों को ढँक कर कमरे में प्रोजेक्टर से फ़िल्म चलाना...
- धनुष-बाण बना कर चलाना...
या फ़िर कभी "कुछ भी" ना करना...

आप क्या चाहते हैं?

Wednesday, January 23, 2008

इन्हें ऐसा आईडिया और इतना पैसा कौन देता है?

मैं मैडमजी से कुछ कहना चाहता था, पर उन्होंने इशारे से मुझे चुप कर दिया. वो कुछ समझने की कोशिश कर रहीं थीं.

मैंने तंग आकर अपना लैपटॉप चालू कर लिया ताकि मैं कुछ काम कर सकू. यह देख कर मैडम ने आँखे तरेरी - कुछ इस अंदाज से कि - कभी तो मेरा साथ दिया करो.

उनकी आज्ञा सर माथे पर. लैपटॉप साइड में रखकर मैं भी समझने की कोशिश करने लगा.

यूं तो मैं ख़ुद को बड़ा समझदार समझता हूँ, पर उस वक्त हर चीज/बात मेरे सर के ऊपर से जा रही थी. मेरी सारी कोशिशें बेकार हो रही थी. मुझे ख़ुद पर झल्लाहट भी होने लगी थी.

थोडा समय बीतते न बीतते मैडम ने भी हथियार डाल दिए. और मौका देख कर मैंने भी अपना लैपटॉप चालू कर लिया. मगर उत्सुकता तो थी ही, सो, बीच बीच में मैं भी सर उठा कर देख रहा था. पर जितना दिमाग लगाता उतना ही कन्फ्यूज होता जा रहा था.

कभी कभी मैडम से नजरें मिलती थी, दोनों बिना किसी भाव के एक दूसरे को देखते थे, कभी रोनी सूरत बना कर एक दूसरे को दिलासा देते थे, कभी अचानक ख़ुद पर ही जोर से हँस कर माहौल सामान्य करने की चेष्टा करते थे.

हम दोनों ही अब इस बात का इंतजार कर रहे थे कि कब यह प्रताड़ना ख़त्म होगी. कब हमे इससे निजात मिलेगा.
हम दोनों ही देख रहे थे कि पैसा तो खूब खर्चा किया हुआ है, मगर फ़िर भी किसी चीज की कमी बुरी तरह खल रही थी.

उस न दिखने और न समझने वाली चीज को हमने खूब खोजा मगर अफसोस वो हमे कहीं नजर नहीं आई. एक लड़का था, और एक लड़की भी. अनजाने चहरे थे. साथ में और भी लोग थे. अधिकतर जाने पहचाने. कुछ तो बोल रहे थे. और बड़ी देर से बोल रहे थे. समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या बोल रहे हैं, और क्यों बोल रहे हैं.

लडके लड़की को बोलना आता है, ये दिखाने के लिए उनसे क्या क्या नहीं बुलवाया गया, सुनते सुनते हमारे सर में दर्द हो उठा, बेचारों को बोलते समय कितना कष्ट हुआ होगा. ऐसा लग रहा था -मानो तेज तेज बोलने की स्पर्धा हो रही ही. लडके ने "gym" में मेहनत की है - ये बताने के लिए उसे क्या क्या " नहीं" पहनाया गया और लड़कियाँ तो जैसे होती ही हैं शरीर दिखाने के लिए.

कितना खर्चा किया गया होगा, ये सोच कर मैं बड़ा दुखी हो जाता हूँ. किसी एक के दिमाग की उपज (या सनक) के कारण कभी कभी ऐसी चीज सामने आ जाती है तो जो ना निगली जाती है और ना उगली जाती है.

मैं तो यह सोचता हूँ कि कोई अपना पैसा किस तरह से इस तरह की चीज बनाने में लगा सकता है? किसी के पास भंसाली जी का इमेल पता या फ़ोन नम्बर हो तो मुझे दीजियेगा - मुझे पूछना है उनसे - इसे बनाने का आईडिया आपको कहाँ से मिला? और कृपया मुझे बता दें कि इसकी कहानी क्या है? और आपके आसपास क्या ऐसा कोई नहीं है जो आपको सही सलाह दे सके?

हमारा तो ये अनुभव रहा "सांवरिया" देख कर. आप अपना अनुभव बताएं.

(कृपया ध्यान दें: यह मूवी रिव्यू नहीं है, इसे आईडिया रिव्यू कह सकते हैं.)

Wednesday, January 16, 2008

क्या सभी इससे चिढ़ते हैं?

 
मैं बात कर रहा हूँ ये अपने गुगल ट्रांसलिटरेशन के गजेट की. जो आजकल बहुत प्रचलित हो रहा है, और लगभग सभी ब्लाग्स पर नजर आ रहा है.
 
वैसे तो ये बड़ा अच्छा टूल है, पर इसमें एक ख़राब बात है और वो है इसका "फोकस".
 
अक्सर ये गजेट ब्लॉग के आख़िर में लगा होता है, और जैसे ही पेज लोड होता है, इसके फोकस के कारण पेज स्क्रोल होकर सबसे नीचे चला जाता है और मुझे इस बात से बड़ी चिढ होती है.
 
अरे भाई, जब मुझे कुछ ट्रांसलेट करना ही नही है तो मैं वह गजेट भी क्यों देखना चाहूँगा? कई बार तो ऐसा हुआ कि मैंने एक ब्लॉग पढा और दूसरे पोस्ट पर क्लिक किया, दूसरा पन्ना खुला मगर फोकस डायरेक्ट कहीं तो भी एकदम नीचे चला गया. और मैं ढूँढता ही रह गया कि अरे मैं कहाँ था और कहाँ पहुँच गया.
 
मेरे ख्याल से टूल में तो कोई बुराई नहीं है, पर इसका फोकस "सेट" नहीं किया होना चाहिए.
 
आपका क्या ख्याल है??

Saturday, December 08, 2007

ज़िंदगी की राहों में, रंजो गम के मेले हैं...

कुछ यादें होती हैं ऐसी जो काफ़ी पुरानी होने पर भी ज़ेहन से अपनी छाप मिटने नहीं देती.
 

वैसी ही कुछ बातों में से है –पाकिस्तानी गज़ल गायक ज़फ़र अली की गाई ये गज़ल. मैं इसको तब से सुनता आ रहा हूँ जब से मैने इसे समझना भी शुरु नहीं किया था. दरअसल, मेरे पापा को गज़लों का बहुत शौक रहा है, और उनका कलेक्शन भी बहुत बड़ा है. घर पर जगजीत सिंह, अनुप जलोटा, तलत अज़ीज़, ज़फ़र अली, गुलाम अली और न जाने किन किन की ढेरों कैसेट्स पड़ी हैं. लगता है कि मुझे भी वहीं से "सुनने" का शौक लग गया है, परंतु शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि मैं खुद गया और कोई रिकार्ड, कैसेट, सीडी वगैरह खरीद कर आया, अरे! समझ नहीं आता यार कि कौन सी लूँ. हाँ जो घर पर है उसी को सुन कर अपना शौक पुरा कर लिया करता था.

 

अब इस गज़ल की बात करें - तो जानें क्यों मुझे यह बहुत पसंद है. आवाज़ और शायरी दोनों. अभी ही बैठ कर सुन रहा था तो जाने क्या सुझी कि जैसे तैसे कर के सारे "बोल" (लिरिक्स) लिख लिये, और सोचा आप सबको परोस दूँ.

 

तो लीजिये, आप भी बोलों का मज़ा लीजिये:-

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आऽऽऽऽ ऽऽ

मैं तमाशाऽऽऽऽऽऽ

तमाऽऽऽशा

मैं तमाशा तो दिखा दूँ सितमाराई का,

क्या कहुँ हश्र में डर है तेरी रुसवाई काऽऽ,

 

ज़िंदगीऽऽऽऽऽऽ

ज़िंदगीऽऽ की उदास राहों में,

इक दीया भी टिमटिमाता है,

ऐ तमन्नाओं से भी गुलऽऽऽ कर दे,

ढल चुकी रात अब कौन आता है.

 

ज़िंदगी की राहों मेंऽऽ, ज़िंदगी की,

ज़िंदगी की राहों मेंऽऽ

ज़िंदगी की राहों मेंऽऽ

रंजो ग़म के मेले हैं,

रंजो ग़म के मेले हैं,

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

और हम अकेले हैं,

और हम अकेले हैं,

 

ज़िंदगी की राहों मेंऽऽ, ज़िंदगी की,

 

आईने के सौ टुकड़े

हम ने कर के देखे हैं,

हम ने कर के देखे हैं,

आईने के सौ टुकड़े

हम ने कर के देखे हैं,

हम ने कर के देखे हैं,

आईने के सौ टुकड़े

हम ने कर के देखे हैं,

एक में भी तन्हा थे

एक में भी तन्हा थे

एक में भी तन्हा थे

और सौ में भी अकेले हैं,

सौ में भी अकेले हैं,

 

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

और हम अकेले हैं,

और हम अकेले हैं,

 

गेसुओं के साये में एक शब गुज़ारीऽऽऽऽ,

गेसुओं के साये में एक शब गुज़ारी है,

गेसुओं के साये में एक शब गुज़ारी है,

आप से जुदा हो कर,

आप से जुदा हो कर

आप से जुदा हो कर

आज तक अकेले हैं,

आज तक अकेले हैं,

 

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

और हम अकेले हैं,

और हम अकेले हैं,

 

गुल पे है फ़िदा बुलबुल

और शम्मा पे है परवाना,

शम्मा पे है परवाना,

शम्मा पे है परवाना,

 

पा नी नी

सा सा सा

नी नी सा

नी नी सा

नी नी रे सा

ग रे सा

रे नी सा

पा नी

मा पा नी

सा सा

 

गुल पे है फ़िदा बुलबुल

शम्मा पे है परवाना,

गुल पे है फ़िदा बुलबुल

शम्मा पे है परवाना,

इस भरी जवानी में

इस भरी जवानी में

इस भरी जवानी में

आप क्यों अकेले हैं,

आप क्यों अकेले हैं,

 

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

और हम अकेले हैं,

और हम अकेले हैं,

 

जब शबाब आया है

आँख क्युँ चुराते हो,

आँख क्युँ चुराते होऽऽऽ,

आँख क्युँऽऽऽ चुराऽऽऽते होऽऽऽ,

जब शबाब आया है

आँख क्युँ चुराते हो,

 

पा नी

सा गा

मा पा

गा मा

रे सा

नी सा

पा नी

मा पा

गा मा

रे नी

सा – गा – मा – पा – नी – सा

ग रे सा

ग रे सा

ग रे सा

 

जब शबाब आया है

आँख क्युँ चुराते हो,

जब शबाब आया है

आँख क्युँ चुराते हो,

बचपने में हम और तुम

बचपने में हम और तुम

बचपने में हम और तुम

साथ साथ खेले हैं,

साथ साथ खेले हैं,

 

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

भीड़ है कयामत की

और हम अकेले हैं,

और हम अकेले हैं,

और हम अकेले हैं,

और हम अकेले हैं.
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(कहीं कोई गलती हो तो जानकार लोगों से अपील है कि बता दें ताकि जल्दी से सुधार ली जाय)

Tuesday, November 27, 2007

शायराना पहेली

बैठे बैठे अचानक ही मेरे दिमाग में ये कीडा कुलबुलाया कि क्यों ना आप लोगों से एक शायराना पहेली पूछी जाय?
पहेली कुछ ऐसी है कि - एक शेर की पहली पंक्ति मैं लिखता हूँ, आप लोग उसे पूरा करने का प्रयत्न करें। दूसरी लाइन कुछ भी हो सकती है। यानी की जरूरी नहीं कि "सीरियस" टाईप की ही हो।

वैसे मेरे पास भी एक 'दूसरी' लाइन है, पर देखते हैं कि दूर दूर बैठे हम लोग एक जैसा सोच सकते हैं या नहीं।

तो लीजिये, पहली लाइन है:

शाम जवान है ....

अब आपकी बारी।

Thursday, November 22, 2007

वो २१५ किलोमीटर

नून तेल लकड़ी पर नई पोस्ट चढाई है।
कुछ तकनीकि कारणों से मेरा वह ब्लाग नारद की नज़रों में नहीं चढा है, इसलिये उसकी कड़ी यहाँ दी है।

वो २१५ किलोमीटर

धन्यवाद.

Monday, November 19, 2007

३० से ३

** यह पोस्ट यहाँ से हटा दी गई है **

दरअसल यह मेरे दूसरे ब्लाग नून तेल लकड़ी के लिये थी जो गलती से यहाँ छप गई थी।
गलती सुधार ली गई है, और अब आप यह पोस्ट यहाँ देख सकते हैं।

धन्यवाद।