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Monday, July 20, 2009

आईये जाने गॉल्फ़ को-२

पिछली कड़ी में आपने गॉल्फ़ के खेल और मैदान के बारे में जाना। इस बार हम इसमें इस्तेमाल होने वाले साधनों पर थोड़ी नज़र डालते हैं।

गॉल्फ़ खेलने के लिये एक अदद मैदान के अलावा और बहुत कुछ चाहिये होता है, इनमें जो सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है वह है - गेंद।

काफ़ी सालों (पढें शतकों) पहले यह चमड़े की बनाई जाती थी, और इसमें एक पक्षी के पंख भरे जाते थे। फ़िर वहाँ से सफ़र बढाते हुये, यह लकड़ी और रबर, स्पंज से होते होते आज की आधुनिक बॉल तक पहुँची है। अब तो यह विभिन्न प्रकार के सिन्थेटीक के मिश्रण से बनाई जाती है।

आजकल यह दो, तीन या चार परतों में बनाई जाती है। इन्हें क्रमश: two-piece, three-piece और four-piece बॉल कहा जाता है।

सामान्यत: एक कड़क खोल, जिसमें तरल या कोई ठोस पदार्थ भरा होता है, को रबर के डोरियों से कस कर लपेटा जाता है और फ़िर अंत में इसपर एक (सिंथेटिक) कवर चढा दिया गया है, इस प्रकार की गेंद इस्तेमाल में लाई जाती है।

गॉल्फ़ के नियमों के मुताबिक इस गेंद का वजन अधिकतम ४५.९३ ग्राम होता है, और इसका व्यास कम से कम ४२.६७ मिमी होता है। यह टेबल टेनिस की बॉल से थोड़ी बड़ी होती है मगर ठोस होती है। इसकी जो खासियत है वह है इसपर पडे हुए छोटे-छोटे छेद, जिन्हें डिम्पल कहा जाता है। (देखें चित्र)।

गॉल्फ़ की गेंद पर जो छिद्र से बने होते है वह वैज्ञानिक कारणो से होते हैं और इन्हीं की वजह से गेंद काफ़ी ज्यादा दूरी तय कर पाती है - करीब २५० से ३५० मीटर तक।

इंटरनेट के एक स्त्रोत की मानें तो किसी खिलाड़ी द्वारा मारे गए सबसे लंबे शॉट का रिकार्ड ४५८ यार्ड्स (४१८.७८ मी) का है, जो कि अमेरिका के जैक हैम के नाम है।

संयोग की बात है कि यह रिकार्ड सोलह साल पहले, आज ही के दिन यानि २० जुलाई १९९३ ही बना था।

चित्र: गॉल्फ़ बॉल
चित्र साभार: www.visualdictionaryonline.com

चित्र में जो बॉल की नीचे एक लम्बी सी वस्तु दिखाई दे रही है (जिसपर बॉल रखी हुई है) उसे Tee/टी कहते हैं।

ध्यान दें कि जिस जगह से खेल शुरु करते हैं उसे क्षेत्र को भी tee कहते हैं और पहला शॉट मारने के लिये बॉल जिस चीज पर रखी जाती है उसे भी tee ही कहते हैं। और शायद इसीलिये हर होल के पहले शॉट को tee-shot कहा जाता है।

यह tee लकड़ी अथवा प्लास्टिक की होती है, और इसका उपयोग सिर्फ़ किसी "होल" को शुरु करने के वक्त पहले शॉट के लिये ही किया जा सकता है।

इस tee को जमीन में गाड़ दिया जाता है और इसपर बॉल रखी जाती है। इस कारण बॉल जमीन से थोड़ी उपर हो जाती है तथा लंबा शॉट मारने के लिये आसानी हो जाती है।

आगे के पोस्ट में हम गोल्फ़ क्लब (जिससे बॉल को hit किया जाता है) के बारे में जानेंगे।

Wednesday, July 08, 2009

लाईफ़ में नया-१

"...मैं आगे आया, मैने देखा, बॉल खसकाई, एंगल सेट किया, और जोर से शॉट मारा। ये क्या, मेरा क्लब बॉल को छुआ तक नहीं। उपर से निकल गया। थोड़ी देर बाद फ़िर ट्राय किया, अबकी बार बॉल हिली और कुछ गज तक गई। तीसरी बार और जोर लगाया, धत्त तेरे कि, इस बार बॉल तो कुछ खास बढी नहीं, हाँ, घास और मिट्टी जरुर काफ़ी दूर तक उड़ गई।"

जी हाँ, दोस्तों, आप सही समझे, मैं गॉल्फ़ सीख रहा हूँ।

मेरी बहुत समय से इच्छा थी, और मौका ही ढुँढ रहा था। मौका भी मिल गया। एक नया गॉल्फ़ कोर्स शुरु हुआ है जहाँ गॉल्फ़ एकेडमी भी है। तो वहाँ पर एक ६ दिन का आरंभिक कोर्स शुरु किया गया है। ऑस्ट्रेलिया से एक प्रोफ़ेश्नल गोल्फ़र आये हैं सिखाने के लिये, नाम है क्लाईव्ह बार्डस्ले। सिखाने के लिये उनके सहायक हैं भारत के नौजवान गॉल्फ़र अनिरबन लाहिरी। मन तो था ही, फ़िर सीनियर प्रोफ़ेश्नल खिलाड़ी (खिलाडियों) से सीखने का मौका। और कहते हैं ना, अच्छे मौके बार बार नहीं मिलते।

बस एक दिक्कत थी, मैडम जी की इच्छा थी कि जब "वो लोग" पुणे आ जायें उसके बाद ही मैं कुछ नया शुरु करूँ। तो कुछ ऐसा मामला जमा कि कोर्स शुरु होने के एक दिन पहले ही मैडम और प्रांजय पुणे पहुँच रहे थे। दूसरी बात थी कि कोर्स के लिये मुझे रोज २ से ढाई घंटे देने पड़ते। तो लग रहा था कि मैडम मना कर देंगी। मगर नहीं, उन्होने सुना, समझा और पुरा सहयोग दिया। और बोलीं कि जाओ अच्छे से सीखना (ताकि बाद में मैं उन्हे सीखा सकूँ)।

अब तीसरी दिक्कत - कोर्स का समय सुबह ७:३० से ९:३०। कोर्स, घर से १६ किमी दूर। ऑफ़ीस का टाईम ९:३०, पर चलो वह तो मैनेज हो जाता है। इतनी फ़्लेक्सिबिलिटी तो है भई हमारे ऑफ़ीस में।

सो ले ही लिया, कोर्स में दाखिला।

तो होता यह है कि सुबह १६ किमी जाना, फ़िर १६ किमी आना और फ़िर ६ किमी पर ऑफ़ीस। उफ़्फ़...!! अपनी गड़्डी की, बोले तो, वाट लग रेली है। गड्डी बोले तो, कार-शार नहीं जी, अपनी दुचाकी, बाईक। तो बाईक की अब कहीं जाके परीक्षा हो रही है। (ये मुये पेट्रोल के दाम भी अभी ही बढने थे)।

इतना तो अच्छा है कि १० किमी हाईवे पर है। सो वह तो ५ से १० मि. में पार हो जाते हैं। बचे ६ किमी हाईवे से अंदर हैं और बुरी बात कि रोड भी पुरी तरह से पक्की नहीं बनी हुई है। बेचारी बाईक, पहले तो ८०-९० फ़िर एकदम से २०-२५।

मेरे साथ उस कोर्स में सीखने वाले, एक तो महाराष्ट्र पुलिस के पीली बत्ती वाले सी.आई.डी. अफ़सर हैं, एक साहब रीयल स्टेट बिल्डर हैं। अपने लड़के (१२-१५ वर्ष का होगा) के साथ सीखते हैं। और बाकि लोग भी किसी ना किसी बड़े व्यवसायी के पुत्र/पुत्री/पत्नी।

यानी कि नौकरी करने वाला और बाईक पर आने वाला - सिर्फ़ अपुनईच्च है। वो क्या है ना कि अपुन तो आलरेडी हज़ारों में एक हूँ ना।

खैर हमे क्या? अपन तो सीखने आये हैं, पुरा पैसा वसूल करते हैं, मन लगा कर सीखते हैं।

अब क्या क्या सीखा कैसे कैसे सीखा यह भी सब बताउंगा।
अपनी अगली कुछ पोस्ट्स में मैं गॉल्फ़ की बातें करूंगा और यह भी बताउंगा कि कोर्स कैसा चल रहा है।

क्या आप कभी खेले हैं गॉल्फ़? अपना अनुभव जरुर बताईयेगा।

वैसे लाईफ़ में इससे भी नया (और अच्छा) बहुत कुछ हुआ है और चल ही रहा है।
वो अंग्रेजी में कहते हैं ना? रीड बिटविन द लाइन्स। तो अगर आपने उपर की लाईन्स अच्छे से पढी होंगी तो समझ ही जायेंगे। :)