Monday, August 17, 2009

कहाँ है हमारा स्वाभिमान?

हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति को हमारे ही देश में एक विदेशी एयरलाईंस के कर्मचारी द्वारा हवाईअड्डे पर तलाशी के नाम पर रोका जाता है। और इस गंभीर बात की अखबारों में तक खबर नहीं बनती।


जबकि हमारे एक "अभिनेता" को एक दूसरे देश में उसी देश के अधिकारियों द्वारा इम्मीग्रेशन के लिये रोका जाता है, और अपने देश का मीडिया सुबह शाम उसी खबर को बढा-चढा कर परोस रहा है।


इसे विडंबना कहें? या यही है हमारा (सोया हुआ) स्वाभिमान?

Sunday, August 02, 2009

बच गये...

अभी अभी आया है फ़ैसला . . .और शायद यही शब्द आये होंगे दिल्ली के दोनो छोरों के घरवालों के मन में ... !!

आपके मन में क्या आया??

Monday, July 20, 2009

आईये जाने गॉल्फ़ को-२

पिछली कड़ी में आपने गॉल्फ़ के खेल और मैदान के बारे में जाना। इस बार हम इसमें इस्तेमाल होने वाले साधनों पर थोड़ी नज़र डालते हैं।

गॉल्फ़ खेलने के लिये एक अदद मैदान के अलावा और बहुत कुछ चाहिये होता है, इनमें जो सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है वह है - गेंद

काफ़ी सालों (पढें शतकों) पहले यह चमड़े की बनाई जाती थी, और इसमें एक पक्षी के पंख भरे जाते थे। फ़िर वहाँ से सफ़र बढाते हुये, यह लकड़ी और रबर, स्पंज से होते होते आज की आधुनिक बॉल तक पहुँची है। अब तो यह विभिन्न प्रकार के सिन्थेटीक के मिश्रण से बनाई जाती है।

आजकल यह दो, तीन या चार परतों में बनाई जाती है। इन्हें क्रमश: two-piece, three-piece और four-piece बॉल कहा जाता है।

सामान्यत: एक कड़क खोल, जिसमें तरल या कोई ठोस पदार्थ भरा होता है, को रबर के डोरियों से कस कर लपेटा जाता है और फ़िर अंत में इसपर एक (सिंथेटिक) कवर चढा दिया गया है, इस प्रकार की गेंद इस्तेमाल में लाई जाती है।

गॉल्फ़ के नियमों के मुताबिक इस गेंद का वजन अधिकतम ४५.९३ ग्राम होता है, और इसका व्यास कम से कम ४२.६७ मिमी होता है। यह टेबल टेनिस की बॉल से थोड़ी बड़ी होती है मगर ठोस होती है। इसकी जो खासियत है वह है इसपर पडे हुए छोटे-छोटे छेद, जिन्हें डिम्पल कहा जाता है। (देखें चित्र)।

गॉल्फ़ की गेंद पर जो छिद्र से बने होते है वह वैज्ञानिक कारणो से होते हैं और इन्हीं की वजह से गेंद काफ़ी ज्यादा दूरी तय कर पाती है - करीब २५० से ३५० मीटर तक।

इंटरनेट के एक स्त्रोत की मानें तो किसी खिलाड़ी द्वारा मारे गए सबसे लंबे शॉट का रिकार्ड ४५८ यार्ड्स (४१८.७८ मी) का है, जो कि अमेरिका के जैक हैम के नाम है।

संयोग की बात है कि यह रिकार्ड सोलह साल पहले, आज ही के दिन यानि २० जुलाई १९९३ ही बना था।

चित्र: गॉल्फ़ बॉल
चित्र साभार: www.visualdictionaryonline.com

चित्र में जो बॉल की नीचे एक लम्बी सी वस्तु दिखाई दे रही है (जिसपर बॉल रखी हुई है) उसे Tee/टी कहते हैं।

ध्यान दें कि जिस जगह से खेल शुरु करते हैं उसे क्षेत्र को भी tee कहते हैं और पहला शॉट मारने के लिये बॉल जिस चीज पर रखी जाती है उसे भी tee ही कहते हैं। और शायद इसीलिये हर होल के पहले शॉट को tee-shot कहा जाता है।

यह tee लकड़ी अथवा प्लास्टिक की होती है, और इसका उपयोग सिर्फ़ किसी "होल" को शुरु करने के वक्त पहले शॉट के लिये ही किया जा सकता है।

इस tee को जमीन में गाड़ दिया जाता है और इसपर बॉल रखी जाती है। इस कारण बॉल जमीन से थोड़ी उपर हो जाती है तथा लंबा शॉट मारने के लिये आसानी हो जाती है।

आगे के पोस्ट में हम गोल्फ़ क्लब (जिससे बॉल को hit किया जाता है) के बारे में जानेंगे।

Thursday, July 09, 2009

आईये जाने गॉल्फ़ को-१

गॉल्फ़ - हॉकी जैसी स्टिक से एक बाल को मारते चलो और मैदान में एक छेद में डाल दो। बस। बुढ्ढों का खेल है जो फ़िट रहने के लिये खेलते हैं। अमीर लोगों के चोंचले हैं..और ना क्या क्या।

ज्यादातर लोगों की गॉल्फ़ के बारे में यही सोच रहती होगी। देखने में तो काफ़ी सरल लगता है। मगर यकीन मानिये इतना भी सरल नहीं है। अभी हम इसके उपर जो टैग (अमीरों का खेल, बुढ्ढों का खेल इत्यादि) चिपका है उसे दरकिनार करते हुये समझते हैं कि आखिरकार यह खेल है क्या।

इस खेल का इतिहास वगैरह जानने के लिये तो कृपया गुगल देव की शरण में ही जायें। यहाँ हम सिर्फ़ इस खेल को सीधे साधे शब्दों में जानेंगे।

गॉल्फ़, एक बहुत बड़े परीसर में खेला जाता है। यह एक ऐसा खेल है जिसमें इसके परिसर का कोई मानक माप नहीं होता। इस परीसर को "कोर्स" कहा जाता है। एक गॉल्फ़ कोर्स को वहाँ मौजुद "होल्स" (कप्स/छेदों) की संख्या से मापा जाता है। ज्यादातर कोर्स नौ (९) या अठारह (१८) होल्स के होते हैं। इसका मतलब एक खिलाड़ी को उस गॉल्फ़ कोर्स में नौ/अठारह अलग अलग क्षेत्र मिलेंगे खेलने के लिए। जैसे किसी रेस में एक start और finish पाईंट होता है, वैसे ही एक "होल/कप" को खेलने के लिये भी एक start और एक finish पाईंट होते हैं। जो start पाईंट होता है उसे टी/Tee कहते हैं। और finish होल/कप पर होता है। इसका मतलब अगर कोई गॉल्फ़ कोर्स १८ होल्स का है तो वहाँ (कम से कम) अठारह Tee और ठीक अठारह Holes होंगे।

कम से कम इसलिये कहा है कि अठारह से अधिक भी tee हो सकती है। याने एक ही hole के लिये अलग अलग starting points भी हो सकते हैं, जो कि अलग अलग श्रेणी के खिलाडियों के लिये हो सकते हैं। श्रेणियाँ जैसे कि महिला खिलाड़ी, सीनियर (वेटरन) खिलाड़ी और प्रोफ़ेश्नल खिलाडी। बिलकुल मेराथन दौड़ की तरह। जहाँ बच्चों, वरिष्ठ, महिलाओं और पुरुषों के लिये अलग अलग start points होते हैं, पर finish point एक ही होता है।

गॉल्फ़ का एक खेल (ज्यादातर) १८ होल्स का ही होता है। जिसमें खिलाडी पहले tee से शुरु करते हैं, कम से कम शाट्स मार कर पहले होल में बाल डालने का प्रयास करते हैं, फ़िर दूसरे tee से शुरु कर के दूसरे होल में बाल पहुँचाते है, और इस तरह अठारह होल्स पुरे करते हैं। एक खेल के अंत में जिस खिलाड़ी ने सबसे कम शाट्स मारे होते हैं वह विजेता घोषित किया जाता है।

जैसे क्रिकेट में inning होती है वैसे ही गॉल्फ़ में "होल" होते हैं। फ़र्क यह होता है कि एक खिलाड़ी को एक-दो नहीं पुरे १८ होल्स खेलने होते हैं। और हर होल अपने आप में एक बड़ा सा मैदान होता है। हर होल में:
- tee और hole दोनो के बीच की दूरी अलग होती है
- tee से hole तक का रास्ता अलग होता है
- tee से hole के रास्ते में अड़चने अलग होती हैं
किसी का भी कोई मानक नहीं होता, यह उस कोर्स की रचना करने वाले पर या/और वहाँ मौजुद प्राकृतिक बाधाओं (वृक्ष, झाडियां इत्यादि) पर निर्भर होता है। और यही सब मिलकर गॉल्फ़ को एक कठीन खेल की श्रेणी में रखते हैं।

Tee का क्षेत्रफ़ल काफ़ी छोटा होता है, बिल्कुल समतल, और एक समान बारीक कटी हुई घास होती है। यहाँ दो मार्कर/चिन्ह होते हैं जिसके बीच में गेंद रख कर खेल आरंभ करना होता है। इस जगह के बाद गेंद को हाथ से छुना नियम विरुद्ध होता है।

Hole, यानि कि जहाँ गेंद डालनी होती है, के आस पास के क्षेत्र को ग्रीन/green कहते हैं। इस जगह की घास बिल्कुल महीन कटी होती है। बिलकुल एक समान। यह क्षेत्र समतल हो जरुरी नहीं। अधिकतर तो यह समतल नहीं होता कहीं एक-दो या किसी भी तरफ़ ढलान सा लिये हुये होता है।

Tee और hole के बीच जो सामान्य क्षेत्र होता है उसे फ़ेअरवे/fairway कहते हैं। यहाँ घास एक समान ही कटी होती है पर green से बड़ी होती है, और fairway में कुछ अड़चने हो सकती है। Fairway के आसपास उसकी सीमा दर्शाने के लिये झाड़ियाँ या पेड़ लगे हो सकते है। परंतु देखा जाये तो एक होल की कोई तय सीमा नहीं होती। मगर सही खेलने के लिये गेंद को tee से fairway होते हुये green और अंत में hole तक ले जाना होता है।

Fairway से बाहर के क्षेत्र को रफ़/rough कहते हैं।

अड़चनें: खेल को और रोचक और कठीन बनाने के लिये green के आस पास, और fairway में अड़चने होती/हो सकती हैं। यह झाड़ी, पेड़ के अलावा रेत से भरा गढ्ढा (बंकर) भी हो सकता है और पानी से भरी झील या पोखर भी हो सकता है। एक खिलाड़ी को इन सबसे बचते हुये अपनी गेंद hole तक पहुँचानी होती है।

अधिकतर गॉल्फ़ कोर्सेस में एक hole के नजदीक ही दूसरे होल का tee होता है ताकि दूसरे होल का खेल शुरु करने के लिये ज्यादा चलना ना पड़े। वैसे पुरे परीसर में एक पतला सा पक्का रास्ता भी बना होता है जहाँ बैटरी से चलने वाली कार, जिसे golf cart कहते है, चलती है। पर यह जरुरी नहीं कि हर गॉल्फ़ कोर्स में यह हो ही।

वैसे तो इस खेल के क्षेत्र/परीसर का कोई मानक माप या रचना नहीं होती है, मगर एक चीज होती है जो मानक होती है।

वह होता है हर hole में गेंद पहुँचाने के लिये लगने वाले शाट्स/स्ट्रोक की संख्या। हर hole को एक शब्द से मापा जाता है - Par/पार। एक tee से उसके होल में गेंद पहुँचाने में लगने वाले मानक शाट्स की संख्या को पार/par कहते हैं। यह निश्चित किया जाता है tee/green के बीच की दूरी को, उसकी अड़चनों को ध्यान में रखकर। यानि की अगर किसी एक होल का पार ४ है तो इसका मतलब एक औसत खिलाड़ी को tee से शुरु करके सिर्फ़ ४ शाट्स में गेंद को hole में डाल देना चाहिये। और इसी तरह से इस खेल में स्कोर रखा जाता है। 'पार' की तुलना में खिलाड़ी का स्कोर मापा जाता है। किसी होल का 'पार' कुछ भी हो सकता है - मगर एक बार तय होने के बाद सामान्यत: 'पार' बदलता नहीं है जब तक की कोर्स में ही कुछ बदलाव ना किया जाय।

इसे इस तरह से समझिये, एक गॉल्फ़ कोर्स में १८ होल्स हैं। हर hole के पार को जोड़ लें। फ़र्ज करें कि वह संख्या ७० आई, तो यह उस कोर्स का मानक हो गया। अब खिलाडियों को कम से कम ७० शाट्स में सारे holes पुरे करने चाहिये। स्कोर रखा जाता है पार से ज्यादा (+) या कम (-) । याने कि अगर किसी का अंतिम स्कोर +५ है तो इसका मतलब उसने ७५ शाट्स लगाये। अगर स्कोर -१० है तो उस खिलाड़ी ने ६० शाट्स में ही सारे holes पुरे कर लिये। जिसका स्कोर सबसे कम होता है वह खिलाड़ी जीतता है।

यह तो हुआ गॉल्फ़ कोर्स का विवरण। आगे ड्राईविंग रेंज और इसमें लगने वाली वस्तुओं (गेंद, स्टिक इत्यादि) की जानकारी लेंगे।

अगर ये विवरण पढकर आपको एक गॉल्फ़ कोर्स देखने का मन हो आया है तो इस लिंक (http://www.bantrygolf.com/courseTour/index.cfm) को देखें। मैने यह कड़ी इंटरनेट से ढुंढी है, इसमे वह सब है जो मैं बताना चाहता था।

१. किसी जानकार को कोई त्रुटी नजर आई हो तो बतायें। दुरुस्त कर ली जायेगी। हम तो अभी अमेच्योर के "अ" भी नहीं हैं।

आगे:

मैं अब कर लुँ क्या?

"डाक'साब, नमस्ते"

नमस्ते, नमस्ते। आईये, बैठिये।

"डाक'साब, लगता है आपने मुझे पहचाना नहीं"

ह्म्म्म...याद तो नहीं आ रहा। आप पहले भी क्लीनिक में आ चुके हैं क्या?

"अरे डाक'साब, मैं पिछले साल आया था ना आपके पास, इलाज के लिये"

अच्छा, क्या हुआ था?

"मुझे हल्का सा बुखार नहीं था? जिसका इलाज आपने किया था"

अच्छा, बिल्कुल भी याद नहीं आ रहा। खैर बताईये, अब कैसे आना हुआ? फ़िर कोई तकलीफ़ है क्या?

"नहीं नहीं डाक'साब, अब तकलीफ़ तो बिलकुल नहीं है।"

फ़िर?

"आपने तब स्नान करने को मना किया था, बस यही पुछना था कि मै अब कर लुँ क्या??"

.........!!!

Wednesday, July 08, 2009

लाईफ़ में नया-१

"...मैं आगे आया, मैने देखा, बॉल खसकाई, एंगल सेट किया, और जोर से शॉट मारा। ये क्या, मेरा क्लब बॉल को छुआ तक नहीं। उपर से निकल गया। थोड़ी देर बाद फ़िर ट्राय किया, अबकी बार बॉल हिली और कुछ गज तक गई। तीसरी बार और जोर लगाया, धत्त तेरे कि, इस बार बॉल तो कुछ खास बढी नहीं, हाँ, घास और मिट्टी जरुर काफ़ी दूर तक उड़ गई।"

जी हाँ, दोस्तों, आप सही समझे, मैं गॉल्फ़ सीख रहा हूँ।

मेरी बहुत समय से इच्छा थी, और मौका ही ढुँढ रहा था। मौका भी मिल गया। एक नया गॉल्फ़ कोर्स शुरु हुआ है जहाँ गॉल्फ़ एकेडमी भी है। तो वहाँ पर एक दिन का आरंभिक कोर्स शुरु किया गया है। ऑस्ट्रेलिया से एक प्रोफ़ेश्नल गोल्फ़र आये हैं सिखाने के लिये, नाम है क्लाईव्ह बार्डस्ले सिखाने के लिये उनके सहायक हैं भारत के नौजवान गॉल्फ़र अनिरबन लाहिरी मन तो था ही, फ़िर सीनियर प्रोफ़ेश्नल खिलाड़ी (खिलाडियों) से सीखने का मौका। और कहते हैं ना, अच्छे मौके बार बार नहीं मिलते।

बस एक दिक्कत थी, मैडम जी की इच्छा थी कि जब "वो लोग" पुणे जायें उसके बाद ही मैं कुछ नया शुरु करूँ। तो कुछ ऐसा मामला जमा कि कोर्स शुरु होने के एक दिन पहले ही मैडम और प्रांजय पुणे पहुँच रहे थे। दूसरी बात थी कि कोर्स के लिये मुझे रोज से ढाई घंटे देने पड़ते। तो लग रहा था कि मैडम मना कर देंगी। मगर नहीं, उन्होने सुना, समझा और पुरा सहयोग दिया। और बोलीं कि जाओ अच्छे से सीखना (ताकि बाद में मैं उन्हे सीखा सकूँ)

अब तीसरी दिक्कत - कोर्स का समय सुबह :३० से :३०। कोर्स, घर से १६ किमी दूर। ऑफ़ीस का टाईम :३०, पर चलो वह तो मैनेज हो जाता है। इतनी फ़्लेक्सिबिलिटी तो है भई हमारे ऑफ़ीस में।

सो ले ही लिया, कोर्स में दाखिला।

तो होता यह है कि सुबह १६ किमी जाना, फ़िर १६ किमी आना और फ़िर किमी पर ऑफ़ीस। उफ़्फ़...!! अपनी गड़्डी की, बोले तो, वाट लग रेली है। गड्डी बोले तो, कार-शार नहीं जी, अपनी दुचाकी, बाईक। तो बाईक की अब कहीं जाके परीक्षा हो रही है। (ये मुये पेट्रोल के दाम भी अभी ही बढने थे)

इतना तो अच्छा है कि १० किमी हाईवे पर है। सो वह तो से १० मि. में पार हो जाते हैं। बचे किमी हाईवे से अंदर हैं और बुरी बात कि रोड भी पुरी तरह से पक्की नहीं बनी हुई है। बेचारी बाईक, पहले तो ८०-९० फ़िर एकदम से २०-२५।

मेरे साथ उस कोर्स में सीखने वाले, एक तो महाराष्ट्र पुलिस के पीली बत्ती वाले सी.आई.डी. अफ़सर हैं, एक साहब रीयल स्टेट बिल्डर हैं। अपने लड़के (१२-१५ वर्ष का होगा) के साथ सीखते हैं। और बाकि लोग भी किसी ना किसी बड़े व्यवसायी के पुत्र/पुत्री/पत्नी।

यानी कि नौकरी करने वाला और बाईक पर आने वाला - सिर्फ़ अपुनईच्च है। वो क्या है ना कि अपुन तो आलरेडी हज़ारों में एक हूँ ना।

खैर हमे क्या? अपन तो सीखने आये हैं, पुरा पैसा वसूल करते हैं, मन लगा कर सीखते हैं।

अब क्या क्या सीखा कैसे कैसे सीखा यह भी सब बताउंगा।
अपनी अगली कुछ पोस्ट्स में मैं गॉल्फ़ की बातें करूंगा और यह भी बताउंगा कि कोर्स कैसा चल रहा है।

क्या आप कभी खेले हैं गॉल्फ़? अपना अनुभव जरुर बताईयेगा।

वैसे लाईफ़ में इससे भी नया (और अच्छा) बहुत कुछ हुआ है और चल ही रहा है।
वो अंग्रेजी में कहते हैं ना? रीड बिटविन लाइन्स। तो अगर आपने उपर की लाईन्स अच्छे से पढी होंगी तो समझ ही जायेंगे। :)

Tuesday, July 07, 2009

क्या आपने कहीं ऐसा होते देखा है? - जवाब

वैसे तो वह कोई पहेली नहीं थी, और ना ही कोई इनाम-शिनाम मिलने वाला था।
पिछली पोस्ट में तो सिर्फ़ इनाम कि घोषणा के बारे में ही लिखा था। :)

इस कहानी की प्रेरणा मुझे अपने देश पर बारंबार आतंकवादी हमले होते हुये, भारत सरकार के रवैये, पाकिस्तान के जवाब, भारत की अमेरिका से शिकायत/मदद की गुहार और उस पर मिलते हुये आश्वासन और निर्देशों को देख कर मिली।

खैर इस विषय पर क्या कहें और कितना कहें?
जो हो रहा है, जैसा चल रहा है उसे देख सुन कर मन थक सा गया है।

चलो, आप लोगों को अब तो उस कहानी के पात्र समझ गये ना?