Friday, August 18, 2006

सॉफ़्टवेअर इंजीनियर आखिर सॉफ़्टवेअर इंजीनियर ही होते हैं

 
दो सॉफ़्टवेअर इंजीनियर शाम को थके हारे पब में बैठ के अपने अपने ग्लास से चुस्कियाँ लगाते हुये बात कर रहे थे.
 
पहला: अरे पता है? पिछले इतवार मेरे साथ क्या हुआ?
 
दूसरा: क्या हुआ?
 
पहला: कल मैं एक पटाखा लडकी से 'बार' में मिला..!! क्या मस्त थी यार......
 
दूसरा: अच्छा? फ़िर "क्या" हुआ??
 
पहला: ह्म्म्म..! मैं उसे अपने फ़्लैट में ले गया, हमने कुछ बातें की, कुछ ड्रिंक्स लिये..और...
 
दूसरा: ..और...? और क्या??
 
पहला: फ़िर अचानक वो बोली कि ..कि वो "कुछ" स्पेशल "फ़ील" करना चाहती है...
 
दूसरा: ...फ़िर..?? फ़िर तुमने क्या किया..??

पहला: ..फ़िर...फ़िर ..मैने उसे अपनी बाहों में उठाया और पलंग पर अपने नये लैपटॉप के बगल में लिटा दिया...
 
दूसरा: सच?? तुमने नया लैपटॉप ले लिया?? क्या कॉन्फ़िग्यूरेशन है??
 
पहला: १ जीबी रैम है...और...१०० जीबी हार्ड डिस्क है...और...ब्लूटूथ है...और...वायरलेस नेटवर्किंग है...और.................!!!!!

8 comments:

Sagar Chand Nahar said...

इसी तरह का एक चुटकुला है
दो सरदार जी आपस में बातें कर रहे थे
पहला: कल मैं रात को घर आ रहा था कि एक पटाखा लडकी ने मेरे सामने अपनी मोटर साईकिल रोकी दी, मुस्कुराई और.....!! क्या मस्त थी यार......
दूसरा: अच्छा? फ़िर "क्या" हुआ??
फ़िर हमने ढ़ेरों बातें की रात गहरा रही थी, अचानक उस ने अपने कपडे़.......शुरु कर दिये;और कहा तुम्हें जो चाहे ले सकते हो,
अच्छा फ़िर तुमने क्या किया?
मैं उसकी यह मॊटर साईकल ले कर भाग आया,
"अच्छा किया वरना लड़की के कपड़े अपने क्या काम के।"

संजय बेंगाणी said...

कमाल करते हो कुलबुलाहटजी तथा सागरभाई किसने कहा की अपने अपने नीजि अनुभव यहाँ लिखो. :)

Udan Tashtari said...

:) हा हा...

क्षितिज said...

और वे कहते हैं कि हिन्दुस्तान में समलैंगिक नहीं होते, सिर्फ विदेशी असर है।

RAJESH KUMAR said...

पढ़ा तो पहले भी था पर हिन्दी मे पढ़कर अच्छा लगा।
राजेश

Vijay Wadnere said...

ओ संजय भीया अरे यार..क्या कहते हो..!?!

ताजी ताजी शादी हुई है यार...
ऐसी टिप्पणी करोगे तो जो कुछ लिख/पढ पा रहा हूँ उससे भी महरूम कर दिया जाउंगा...!!

(वैसे अब असली बात आपको पता चल गई है तो अपने तक ही रखो ना...)


क्षितिज भाई...!! गाड़ी कहीं और चल दी क्या?? ;)

प्रियंकर said...

भक्त कवि सूरदास ने अपने एक पद में कहा है:


ऊधो , मन माने की बात।
दाख छुहारा छांड़ि अमरित फल बिस कीरा बिस खात।

तो भैये अपनी-अपनी पसंद और 'फ़िक्सेशन' की बात है . क्या किया जा सकता है .

रजनीश मंगला said...

आपकी ये वाली पोस्ट यहां डाली गई है।