Monday, June 19, 2006

९ मई २००६ से १६ जून २००६

९ मई २००६ से १६ जून २००६ तक की कहानी
मैं: आशिक की है बारात जरा झूम के निकलो....
वह: ले के पहला पहला प्यार...भर के आँखों में खुमार..जादूनगरी से...
मैं: ले जायेंगे...ले जायेंगे...दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे...
वह: तुझे जीवन की डोर से बांध लिया है...
मै: कभी कभी मेरे दिल में..खयाल आता है...
वह: मांग के साथ तुम्हारा...मैने...मांग लिया संसार...
मैं: ये हवा ये नदी का किनारा...चाँद तारों का रंगीन इशारा...
वह: आधा है चंद्रमा रात आधी... रह ना जाये तेरी मेरी बात आधी ...
मैं: ऐ जाते हुये लम्हों... जरा ठहरो, जरा ठहरो..मैं भी तो चलता हूँ...
वह: परदेस जाके परदेसिया....भूल ना जाना पिया...
मैं: तेरी जुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं मांगी थी...कैद मांगी थी..रिहाई तो नहीं मांगी थी..
वह: मेरे पिया गये रंगून, किया है वहाँ से टेलीफ़ून...
मैं: याद किया दिल ने कहाँ तो तुम, झुमती बहारें कहाँ हो तुम...
वह: आजा रे...अब मेरा दिल पुकारा...रो रो के गम भी हारा...
मैं: तू कहाँ...ये बता...इस नशीली रात में...माने ना मेरा दिल दिवाना..हो...
वह: ओ माझी...ओ माझी..ओ...मेरे साजन हैं उस पार, मैं इस पार...अबकी बार...ले चल पार...
मैं: आयेगी वो आयेगी...दौड़ी चली आयेगी...सुन के मेरी.. आवाज़ आयेगी...
वह: पालकी पे होके सवार चली रे...मैं तो अपने साजन के पास चली रे...
मैं: आने वाली है...मिलन की घड़ी...
वह: कैसे कटे दिन...कैसे कटी रातें..पुछो ना साजना...जुदाई की बातें...
मैं: बहारों फ़ूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है...
वह: वो चाँद खिला, ये तारे हँसे...ये रात अजब मतवाली है...
मै: आके तेरी बाहों में...हर शाम लगे सिंदूरी...
वह: झिलमिल सितारों का आँगन होगा, रिमझिम बरसता सावन होगा...
मैं: तू मेरे सामने...मैं तेरे सामने...तुझको देखूँ के प्यार करूँ...
वह: ये रात भीगी...ये मस्त फ़िजायें...सोने भी नहीं देता मौसम का ये नजारा...
हम: जनमों के साथी, दीया और बाती,..हम साथ-साथ हैं..

Friday, June 16, 2006

आरक्षण: एक और उदाहरण (व्यंग्य)

चिंटू खरगोश और बंटू कछुआ इंजीनियरींग प्रवेश की परीक्षा में बैठे.

जब परिणाम आया तो सबने देखा कि चिंटू को ८३% अंक मिले हैं जबकि बंटू को मात्र ६१%.

मगर फ़िर भी इंजीनियरींग कॉलेज में बंटू कछुए को ही दाखिला मिलता है.

क्या आप जानते हैं क्यों??

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सोचिये सोचिये!!

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अरे खेल कोटे में यार.
आप लोग भी ना! जाने कहाँ से जात-पात वगैरह वगैरह सोचने लगते हैं.

भूल गये क्या? जब बचपन में, खरगोश और कछुए की दौड़ हुई थी तो उस दौड़ में कौन जीता था?
कछुआ ही तो जीता था ना? फ़िर??

Thursday, June 15, 2006

किताबें और मेरा बचपन

परिचर्चा में, पुस्तकों से प्यार, टापिक पर अपना पोस्ट करते समय मैं अपने बचपन में चला गया था, जब मैं अक्सर कॉमिक्सों से घिरा रहा करता था.
 
मुझमें पुस्तकों, खासकर हिन्दी की कॉमिक्स, या चाहे कोई और पत्रिका, पढने का शौक या चस्का बचपन ही से लग गया था.
 
गर्मी की छुट्टियों में चाहे किताबें खरीदना हो या निकटतम लायब्रेरी से लाना हो, मैं हमेशा तैय्यार रहता था.
 
वैसे, इस शौक के पीछे मेरे पापा का भी बड़ा हाथ है, कारण कि उन्हे भी पढने का काफ़ी शौक है, और वो हमें (याने मेरे बडे़ भाई को और मुझे) पढने में काफ़ी प्रोत्साहन देते थे.
 
और एक कारण है मेरे इस शौक के परवान चढने का - वह यह कि - पढने लायक सामग्री की उपलब्धता - वह भी प्रचुरता में.
 
पढने की हमारी कहानी तीन शहरों में फ़ैली हुई है. यहाँ एक बात जाहिर कर दूँ - पढने में आप लोग "पढाई" को शामिल ना करें तो ही अच्छा होगा.
हाँ तो, पहले हम (हमारा परिवार) भोपाल में रहा करते थे. दो और शहर होते थे, जहाँ हर गर्मी की छुट्टियों में जाना होता था: इन्दौर और उज्जैन.
 
तो ऐसा था कि भोपाल में हमारे एक परीचित परिवार था जिनकी खुद की एक अदद लायब्रेरी थी. ढेर सारी कॉमिक्सें, पत्रिकायें इत्यादि. मेरी और मेरे भाई कि अक्सर यहा कोशिश होती थी कि हम यदा कदा उन्ही के यहाँ जायें. जैसे तैसे कोशिश किया करते थे कि मम्मी पापा को वहाँ जाने के लिये पटाया जाये. और वहाँ पहुँचते ही दीन-दुनिया से बेखबर हो, बस बैठ जाते थे. एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी....उफ़्फ़. लगता था कि आयें हैं तो सारी की सारी ही पढ ली जाय. क्या पता "कल हो ना हो". हाँ वहाँ उपन्यास भी हुआ करते थे, अरे वही सुरेन्द्र मोहन पाठक वगैरह के, मगर चुँकि हम उस वक्त छोटों की श्रेणी में आते थे (यह बात होगी जब हम पढना समझने से ८वीं कक्षा तक की उम्र में थे) सो उन तक हमारी पहुँच नहीं थी. (उनके यहाँ एक बिल्ली भी थी, और उसके छोटे छोटे पिल्लू भी थे - बिल्कुल रुई के गोलों की मानिंद).
और फ़िर एक सरकारी लायब्रेरी थी, जिसके की पापा सदस्य थे. हजारों उपन्यास (साहित्यिक उपन्यास कहना उचित होगा). मुझे तो याद भी नहीं कि मैने किन किन साहित्यकारों के उपन्यास चाट डाले होंगे. आत्मकथाएं, कविताएं, शेरो-शायरियाँ इत्यादि को छोड़ कर मैने ऐतिहासिक उपन्यास भी खुब पढे और नाटक, तथा अन्य उपन्यास भी.
 
आते हैं इन्दौर में - जहाँ हमारी दादी रहती थी, वहीं पास ही में था एक सरकारी पुस्तकालय (शायद नेहरू बाल पुस्तकालय, या पता नहीं क्या नाम था) - मालवा मिल वाले क्षेत्र में था चन्द्रगुप्त टॉकिज के सामने. वहाँ ऐसा होता था कि - वहीं बैठ कर पढना हो तो मुफ़्त में और अगर घर लानी तो कोई पुस्तक तो कुछ शायद २० - ३० पैसे लगते होंगे. रोज सुबह नहा-धो के लगभग १०:००-१०:३० तक वहाँ पहुँच जाते थे. १-२ घंटे तो वहीं बैठ कर पढते रहते. और फ़िर १ - २ किताबें ले कर भी आते. भई, दोपहर को भी तो पढने के लिये कुछ चाहिये कि नहीं.
मगर वह लायब्रेरी थी तो सरकारी ही ना. नई तरह कि किताबें ही नहीं आती थी. तो फ़िर एक दूसरी लायब्रेरी पकड़ी गई (शायद "अरोरा लायब्रेरी") यह भी वहीं थी. याने मालवा मिल के चौराहे के पास. वहाँ क्या "कलेक्शन" था...बाप रे! वहाँ से नया प्रयोग किया गया. "डायजेस्ट" और "बाल पाकेट बुक्स" पढने का. क्यों? अरे कॉमिक्स तो फ़टाक से खत्म हो जाया करती थी ना.
 
 
और उज्जैन में - वाह, वहाँ एक और परीचित थे, जिनकी खुद की लायब्रेरी थी. और एक दुकान भी. तो कॉमिक्स उठाओ, और दुकान पर बैठ जाओ. मुझे बडा अच्छा लगता था दुकान पर बैठना. लोगबाग कुछ खरीदने आते थे तो सामान निकालो, तौलो...हम्म्म.. ना भूलने लायक अनुभव होत था. तो एक समय ऐसा आया कि हमने उनके यहाँ का सारा बाल साहित्य (अरे कॉमिक्सें इत्यादि) पढ पढ कर खत्म कर दिये. फ़िर बाल पाकेट बुक्स. और फ़िर कब हम धीरे से वो मोटे वाले उपन्यासों पर कुद गये पता ही नही चला. मगर धुन ऐसी होती थी कि एक बार जो उपन्यास उठाया, तो पुरा किये बगैर नहाना-धोना, खाना-पीना सब बंद. याने कि अगर हमारे हाथ में कोई नावेल है तो हम किसी काम के नही रहते थे.
 
शायद खुब ज्यादा कॉमिक्स पढने का ही कारण रहा होगा कि मैं हिन्दी तो फ़र्राटे से पढने लगा था. कॉमिक्सें तो ५-१० मि० मे खत्म. मेरे कुछ दोस्त आश्चर्य करते थे कि मैं इतनी जल्दी कैसे पढ पाता हूँ. मेरा पढने का तरीका ही कुछ ऐसा होता था जिससे उनको शक होता था. कॉमिक्स तो ऐसे पढता था कि उनलोगों को लगता था कि मैं बस नजर घुमा रहा हूँ पन्नों पर. कई बार बड़ा मजा आता था जब वो मुझे चैलेंज करते थे कि -तुमने पढी नही- फ़िर मैं जो पढा था उसे रीपीट कर के बताता था....!
 
और फ़िर शायद यही कारण होगा कि मैने उपन्यास पढना शुरू किये. कम से कम कुछ घंटे तो चलता था. :)
 
और फ़िर बाकी रही सही कसर पापा का संग्रह पुरा कर देता था.
 
कालेज खत्म होने तक यही हाल रहा, जब तक पुस्तकें पढने का समय भी निकाल लेता था और पुस्तकों की उपल्ब्धता भी होती थी. अब उतनी शिद्दत से तो नहीं, पर यदा कदा, जब कही कोई अच्छी किताब मिल जाती है तो छोडता नहीं हूँ.
 
अब जब भी "कभी घर जाना होता है", पापा के संग्रह में कोई ना कोई नई किताब मिल ही जाती है.
देखें, अब कब जाना होता है.....
 
बचपन की और यादें फ़िर कभी ..!!
 

Wednesday, June 07, 2006

फ़िर लीजिये, पुनः हाजिर हुये, हाइकू लिये!!

फ़िर पिछली कहानी दोहराई गई है.
बात दरअसल ये है कि 'हाइकू' होती ही इतनी छोटी है कि एक लिखने से मन नही भरता, और ज्यादा लिख दो तो यहाँ छापने का मन करने लगता है.
तो इस बार भी वही हुआ, लिखी तो वहाँ (परिचर्चा) पर थी, मगर फ़िर उठा कर यहाँ धर दी गई है.
 
बताईये तो, कैसी बन पड़ी है!?!
 
हूँ परेशान,
ज़िंदगी की ये राह,
नहीं आसान!!
 
ना कोई पास,
किस की करूँ आस,
दिल उदास!!
 
घर से दूर,
हाँ, हूँ मैं मजबूर,
क्या है कसूर?
 
ऐ मेरे नबी*,
अब तू बता, क्या है
यही जिंदगी?
 
है अजनबी,
लगते अब सभी,
थे पास कभी!!
 
झुमे आँगन,
खिले उठे ये मन,
करो जतन!!
 
हे भगवान!!
सेव मी ओ' जीसस!!
खुदा रहम!!
 
_____________________
*नबी= ईश्वरदूत, भविष्यद्वक्ता
 
 

Monday, June 05, 2006

दिल का हाल..कह तो दिया अब.. दिल को खोल..!!

परिचर्चा में बड़ी चर्चा थी "हाइकू" की.
हम भी जा पहुँचे और बड़े-बुढों को लिखता देख हमने भी हाथ मारा,
और सबसे पहली बनाई ये वाली:-

क्या होती है ये?
इसे कविता कहें?
है गणित ये!!



आज जब चुटकुलेबाजी से फ़ुर्सत मिली तो से घुमते घामते फ़िर हाइकू सेक्शन तक आ पहुँचे.
सोचा आज एक अदद और लिख दी जाय.

तो जनाब, बनाने बैठे.
अब जब बनते बनते उम्मीद से काफ़ी बड़ी बन गई तो मन में लालच आ गया.
सोचा परिचर्चा तक ही क्यों इसे सीमित रखें, ऐसे "कलात्मक पीस" को तो अपने चिठ्ठे पर ही जगह मिलनी चाहिये.

तो साहेबान, पेश-ए-खिदमत है,
हाल-ए-हाइकू:

सोचा बहुत,
लिखूँ मैं कुछ और,
है नया दौर!

'आरक्षण' है
'महाजन' भी तो है
जिंदगी बोर...!

मन में व्यथा
और है व्याकुलता
बाहर शोर..!!

काम करते,
हम व्यस्त दिखते,
मन में चोर..!!

विरह में हैं,
इंतजार में रहें,
कितना और..!!

सपना मेरा,
खुशियों का बसेरा,
सांझ या भोर..!!

समय हुआ,
हम चलते बने,
घर की ओर..!!

कामना भी है,
मन करता अब,
जाऐं इन्दौर..!!

बहुत हुआ,
अब मत कहना-
कि वंस मोर..!!

नाम है मेरा,
विजय वडनेरे,
ना कोई और..!!

Thursday, June 01, 2006

कुछ खास नहीं...

आज कुछ खास नहीं है लिखने के लिये, मगर काफ़ी दिनो से कुछ लिखा नही है तो कुछ अजीब सा लग रहा था.
 
हाँ, ये बात और है कि हम "परिचर्चा" पर बराबर नज़र रखे हुये हैं, और बकायदा, ऑफ़िस में बॉस की नज़र बचा कर परिचर्चा के रनवे पर अपनी (खटारा) गाड़ी दौड़ाते रहते हैं.
 
अरे मिंया, आप इसे कोई आसान काम समझते है क्या? अरे ज़नाब बॉस को इस बात का यकीं दिलाते हुये कि बन्दा जोर-शोर से उनके दिये काम को निभा रहा है, फ़ोरम पर सब लोगों की चर्चा पर नज़र रखना और बकायदा अपनी (जबरजस्ती की) राय देते चलना.
 
और राय भी कैसी, कभी शेर-ओ-शायरी करो, तो कभी कविताएँ लिखो, अब एक नया शगुफ़ा चल पड़ा है - हाइकु - का. तौबा तौबा, बड़ा मुश्किल काम है यार. बची खुची कसर वो "चुटकुले" वाले फ़ोरम ने निकाल दी.
 
कुछ कोड लिखने या कुछ अपने प्रोजेक्ट के बारे में सोचने बैठो तो दिमाग में सारा का सारा हिन्दी साहित्य घुमता रहता है.
 
यही सोचते रह जाते हैं कि -
 
- पंकज भाई ने क्या कहा होगा?
- लवन बागला भाई ने क्या जवाब दिया होगा?
- नाहर जी क्या बोले?
- जीतू भीया के श्रीमुख से क्या वचन निकले होंगे...
इत्यादि इत्यादि.
 
वैसे हमने इस मुश्किल से बाहर निकलने का एक हल सोचा है - हमने जीतू भैय्या को एक "सजेशन" टिकाया कि हमें कुवैत में उनकी ही कंपनी में एक (बहुत) बड़े से पद पर नौकरी दे दी जाय.
 
अब बस, ऑफ़िस के काम धाम तो जीतू भैय्या कर लेंगे (या किसी शेख या मलबारी से करवा लेंगे - ये उनका टेंशन), और अपन?? अपन तो दिन भर बिन्दास कभी ब्लाग, तो कभी टिप्पणी, तो बाकी समय परियों की चर्चा आई मीन - परिचर्चा, करते बैठेंगे.
 
कैसा है सुझाव??
अपने अमूल्य सुझाव देकर मेरे सुझाव को "और" परिष्कृत करने का कष्ट करें.