Friday, May 29, 2009

समझ का फ़ेर: चुटकुला

एक आदमी डॉक्टर के पास पहुँचा और बोला -

आदमी: डॉक्टर डॉक्टर, मेरी मदद कीजिये, मेरी आवाज में थोड़ी प्राब्लम है।
डॉ.: बताओ, क्या बात है?
आदमी: डॉक्टर, बात ये है कि मैं को बोलता हूँ।
डॉ.: अरे! यह कैसी परेशानी हुई? सभी लोग तो को बोलते हैं।
आदमी: अरे डॉक्टर, औरों का मुझे क्या पता, पर मैं तो को बोलता हूँ।
डॉ.: अरे! अजीब आदमी हो, मैं बोल तो रहा हूँ कि हर कोई को ही बोलता है।
आदमी: अरे ओ डॉक्टर, मैं बोल रहा हूँ कि मैं--को- बोलता हूँ।
डॉ.: हे भगवान, इसे कैसे समझाउँ? अरे! भले मानस, सब लोग को बोलते हैं, मैं को बोलता हूँ, और तो और तुम भी को ही बोल रहे हो।
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आदमी: अरे डॉक्टर फ़ाहब, मैं कब फ़े मझा रहा हूँ, आप तो मझने का नाम ही नहीं ले रहे। अरे माना लोग को बोलते हैं, आप को बोलते हो...पर मैं तो को बोल रहा हूँ ना। और कैफ़े मझाउँ?? आपको फ़ुनाई दे रहा होगा कि मैं को बोलता हूँ, पर मुझे तो पता है ना कि मैं को नहीं, बोलता हूँ, और ये मैं मझ रहा हूँ कि मैं ही नहीं बोल रहा हूँ। और ये इत्ती फ़ी बात आपकी मझ में ही नहीं आ रही है। मैंने इतना मझाया, लगता है आपकी मझ में फ़िर भी नहीं आया, फ़िर फ़े मझाउँ क्या??

डॉ.: @#$%$!$!$!!$!!@@#@!@!@&^*^&*!!!!

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कुछ आपकी मझ में आया???

4 comments:

सागर नाहर said...

ही ही ही
फजेदार चुटकुला।
फे भी फ को फ बोलता हूं।
:)

mahashakti said...

वाकई, फमझदारों के लिये यह चुटकुला है। कब से डाक्‍टर फाहब को फमझ की नही आ रहा था।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

हा हा हा.......बहुत बढिया रहा..

Udan Tashtari said...

हा हा!! मजेदार!!