"डाक'साब, नमस्ते"
नमस्ते, नमस्ते। आईये, बैठिये।
"डाक'साब, लगता है आपने मुझे पहचाना नहीं"
ह्म्म्म...याद तो नहीं आ रहा। आप पहले भी क्लीनिक में आ चुके हैं क्या?
"अरे डाक'साब, मैं पिछले साल आया था ना आपके पास, इलाज के लिये"
अच्छा, क्या हुआ था?
"मुझे हल्का सा बुखार नहीं था? जिसका इलाज आपने किया था"
अच्छा, बिल्कुल भी याद नहीं आ रहा। खैर बताईये, अब कैसे आना हुआ? फ़िर कोई तकलीफ़ है क्या?
"नहीं नहीं डाक'साब, अब तकलीफ़ तो बिलकुल नहीं है।"
फ़िर?
"आपने तब स्नान करने को मना किया था, बस यही पुछना था कि मै अब कर लुँ क्या??"
.........!!!
Thursday, July 09, 2009
Wednesday, July 08, 2009
लाईफ़ में नया-१
"...मैं आगे आया, मैने देखा, बॉल खसकाई, एंगल सेट किया, और जोर से शॉट मारा। ये क्या, मेरा क्लब बॉल को छुआ तक नहीं। उपर से निकल गया। थोड़ी देर बाद फ़िर ट्राय किया, अबकी बार बॉल हिली और कुछ गज तक गई। तीसरी बार और जोर लगाया, धत्त तेरे कि, इस बार बॉल तो कुछ खास बढी नहीं, हाँ, घास और मिट्टी जरुर काफ़ी दूर तक उड़ गई।"
जी हाँ, दोस्तों, आप सही समझे, मैं गॉल्फ़ सीख रहा हूँ।
मेरी बहुत समय से इच्छा थी, और मौका ही ढुँढ रहा था। मौका भी मिल गया। एक नया गॉल्फ़ कोर्स शुरु हुआ है जहाँ गॉल्फ़ एकेडमी भी है। तो वहाँ पर एक ६ दिन का आरंभिक कोर्स शुरु किया गया है। ऑस्ट्रेलिया से एक प्रोफ़ेश्नल गोल्फ़र आये हैं सिखाने के लिये, नाम है क्लाईव्ह बार्डस्ले। सिखाने के लिये उनके सहायक हैं भारत के नौजवान गॉल्फ़र अनिरबन लाहिरी। मन तो था ही, फ़िर सीनियर प्रोफ़ेश्नल खिलाड़ी (खिलाडियों) से सीखने का मौका। और कहते हैं ना, अच्छे मौके बार बार नहीं मिलते।
बस एक दिक्कत थी, मैडम जी की इच्छा थी कि जब "वो लोग" पुणे आ जायें उसके बाद ही मैं कुछ नया शुरु करूँ। तो कुछ ऐसा मामला जमा कि कोर्स शुरु होने के एक दिन पहले ही मैडम और प्रांजय पुणे पहुँच रहे थे। दूसरी बात थी कि कोर्स के लिये मुझे रोज २ से ढाई घंटे देने पड़ते। तो लग रहा था कि मैडम मना कर देंगी। मगर नहीं, उन्होने सुना, समझा और पुरा सहयोग दिया। और बोलीं कि जाओ अच्छे से सीखना (ताकि बाद में मैं उन्हे सीखा सकूँ)।
अब तीसरी दिक्कत - कोर्स का समय सुबह ७:३० से ९:३०। कोर्स, घर से १६ किमी दूर। ऑफ़ीस का टाईम ९:३०, पर चलो वह तो मैनेज हो जाता है। इतनी फ़्लेक्सिबिलिटी तो है भई हमारे ऑफ़ीस में।
सो ले ही लिया, कोर्स में दाखिला।
तो होता यह है कि सुबह १६ किमी जाना, फ़िर १६ किमी आना और फ़िर ६ किमी पर ऑफ़ीस। उफ़्फ़...!! अपनी गड़्डी की, बोले तो, वाट लग रेली है। गड्डी बोले तो, कार-शार नहीं जी, अपनी दुचाकी, बाईक। तो बाईक की अब कहीं जाके परीक्षा हो रही है। (ये मुये पेट्रोल के दाम भी अभी ही बढने थे)।
इतना तो अच्छा है कि १० किमी हाईवे पर है। सो वह तो ५ से १० मि. में पार हो जाते हैं। बचे ६ किमी हाईवे से अंदर हैं और बुरी बात कि रोड भी पुरी तरह से पक्की नहीं बनी हुई है। बेचारी बाईक, पहले तो ८०-९० फ़िर एकदम से २०-२५।
मेरे साथ उस कोर्स में सीखने वाले, एक तो महाराष्ट्र पुलिस के पीली बत्ती वाले सी.आई.डी. अफ़सर हैं, एक साहब रीयल स्टेट बिल्डर हैं। अपने लड़के (१२-१५ वर्ष का होगा) के साथ सीखते हैं। और बाकि लोग भी किसी ना किसी बड़े व्यवसायी के पुत्र/पुत्री/पत्नी।
यानी कि नौकरी करने वाला और बाईक पर आने वाला - सिर्फ़ अपुनईच्च है। वो क्या है ना कि अपुन तो आलरेडी हज़ारों में एक हूँ ना।
खैर हमे क्या? अपन तो सीखने आये हैं, पुरा पैसा वसूल करते हैं, मन लगा कर सीखते हैं।
अब क्या क्या सीखा कैसे कैसे सीखा यह भी सब बताउंगा।
अपनी अगली कुछ पोस्ट्स में मैं गॉल्फ़ की बातें करूंगा और यह भी बताउंगा कि कोर्स कैसा चल रहा है।
क्या आप कभी खेले हैं गॉल्फ़? अपना अनुभव जरुर बताईयेगा।
वैसे लाईफ़ में इससे भी नया (और अच्छा) बहुत कुछ हुआ है और चल ही रहा है।
वो अंग्रेजी में कहते हैं ना? रीड बिटविन द लाइन्स। तो अगर आपने उपर की लाईन्स अच्छे से पढी होंगी तो समझ ही जायेंगे। :)
जी हाँ, दोस्तों, आप सही समझे, मैं गॉल्फ़ सीख रहा हूँ।
मेरी बहुत समय से इच्छा थी, और मौका ही ढुँढ रहा था। मौका भी मिल गया। एक नया गॉल्फ़ कोर्स शुरु हुआ है जहाँ गॉल्फ़ एकेडमी भी है। तो वहाँ पर एक ६ दिन का आरंभिक कोर्स शुरु किया गया है। ऑस्ट्रेलिया से एक प्रोफ़ेश्नल गोल्फ़र आये हैं सिखाने के लिये, नाम है क्लाईव्ह बार्डस्ले। सिखाने के लिये उनके सहायक हैं भारत के नौजवान गॉल्फ़र अनिरबन लाहिरी। मन तो था ही, फ़िर सीनियर प्रोफ़ेश्नल खिलाड़ी (खिलाडियों) से सीखने का मौका। और कहते हैं ना, अच्छे मौके बार बार नहीं मिलते।
बस एक दिक्कत थी, मैडम जी की इच्छा थी कि जब "वो लोग" पुणे आ जायें उसके बाद ही मैं कुछ नया शुरु करूँ। तो कुछ ऐसा मामला जमा कि कोर्स शुरु होने के एक दिन पहले ही मैडम और प्रांजय पुणे पहुँच रहे थे। दूसरी बात थी कि कोर्स के लिये मुझे रोज २ से ढाई घंटे देने पड़ते। तो लग रहा था कि मैडम मना कर देंगी। मगर नहीं, उन्होने सुना, समझा और पुरा सहयोग दिया। और बोलीं कि जाओ अच्छे से सीखना (ताकि बाद में मैं उन्हे सीखा सकूँ)।
अब तीसरी दिक्कत - कोर्स का समय सुबह ७:३० से ९:३०। कोर्स, घर से १६ किमी दूर। ऑफ़ीस का टाईम ९:३०, पर चलो वह तो मैनेज हो जाता है। इतनी फ़्लेक्सिबिलिटी तो है भई हमारे ऑफ़ीस में।
सो ले ही लिया, कोर्स में दाखिला।
तो होता यह है कि सुबह १६ किमी जाना, फ़िर १६ किमी आना और फ़िर ६ किमी पर ऑफ़ीस। उफ़्फ़...!! अपनी गड़्डी की, बोले तो, वाट लग रेली है। गड्डी बोले तो, कार-शार नहीं जी, अपनी दुचाकी, बाईक। तो बाईक की अब कहीं जाके परीक्षा हो रही है। (ये मुये पेट्रोल के दाम भी अभी ही बढने थे)।
इतना तो अच्छा है कि १० किमी हाईवे पर है। सो वह तो ५ से १० मि. में पार हो जाते हैं। बचे ६ किमी हाईवे से अंदर हैं और बुरी बात कि रोड भी पुरी तरह से पक्की नहीं बनी हुई है। बेचारी बाईक, पहले तो ८०-९० फ़िर एकदम से २०-२५।
मेरे साथ उस कोर्स में सीखने वाले, एक तो महाराष्ट्र पुलिस के पीली बत्ती वाले सी.आई.डी. अफ़सर हैं, एक साहब रीयल स्टेट बिल्डर हैं। अपने लड़के (१२-१५ वर्ष का होगा) के साथ सीखते हैं। और बाकि लोग भी किसी ना किसी बड़े व्यवसायी के पुत्र/पुत्री/पत्नी।
यानी कि नौकरी करने वाला और बाईक पर आने वाला - सिर्फ़ अपुनईच्च है। वो क्या है ना कि अपुन तो आलरेडी हज़ारों में एक हूँ ना।
खैर हमे क्या? अपन तो सीखने आये हैं, पुरा पैसा वसूल करते हैं, मन लगा कर सीखते हैं।
अब क्या क्या सीखा कैसे कैसे सीखा यह भी सब बताउंगा।
अपनी अगली कुछ पोस्ट्स में मैं गॉल्फ़ की बातें करूंगा और यह भी बताउंगा कि कोर्स कैसा चल रहा है।
क्या आप कभी खेले हैं गॉल्फ़? अपना अनुभव जरुर बताईयेगा।
वैसे लाईफ़ में इससे भी नया (और अच्छा) बहुत कुछ हुआ है और चल ही रहा है।
वो अंग्रेजी में कहते हैं ना? रीड बिटविन द लाइन्स। तो अगर आपने उपर की लाईन्स अच्छे से पढी होंगी तो समझ ही जायेंगे। :)
Tuesday, July 07, 2009
क्या आपने कहीं ऐसा होते देखा है? - जवाब
वैसे तो वह कोई पहेली नहीं थी, और ना ही कोई इनाम-शिनाम मिलने वाला था।
पिछली पोस्ट में तो सिर्फ़ इनाम कि घोषणा के बारे में ही लिखा था। :)
इस कहानी की प्रेरणा मुझे अपने देश पर बारंबार आतंकवादी हमले होते हुये, भारत सरकार के रवैये, पाकिस्तान के जवाब, भारत की अमेरिका से शिकायत/मदद की गुहार और उस पर मिलते हुये आश्वासन और निर्देशों को देख कर मिली।
खैर इस विषय पर क्या कहें और कितना कहें?
जो हो रहा है, जैसा चल रहा है उसे देख सुन कर मन थक सा गया है।
चलो, आप लोगों को अब तो उस कहानी के पात्र समझ आ गये ना?
पिछली पोस्ट में तो सिर्फ़ इनाम कि घोषणा के बारे में ही लिखा था। :)
इस कहानी की प्रेरणा मुझे अपने देश पर बारंबार आतंकवादी हमले होते हुये, भारत सरकार के रवैये, पाकिस्तान के जवाब, भारत की अमेरिका से शिकायत/मदद की गुहार और उस पर मिलते हुये आश्वासन और निर्देशों को देख कर मिली।
खैर इस विषय पर क्या कहें और कितना कहें?
जो हो रहा है, जैसा चल रहा है उसे देख सुन कर मन थक सा गया है।
चलो, आप लोगों को अब तो उस कहानी के पात्र समझ आ गये ना?
Thursday, July 02, 2009
क्या आपने कहीं ऐसा होते देखा है?
[उंगली]
...उँ...
[चिमटी]
...ऐ...
[चिमटी]
...ऐ...ऐ...
[चिमटी]
...ओए..अब मत करियो...
[चिमटी]
...अबे...अब करेगा तो देख लेना...
[चिमटी]
...अरे! फ़िर?...अब मत करना...
[चिमटी]
...अब मैं इधर ही देख रहा हूँ, अब कर के दिखा...
[चटाक्]
...अब तो हद हो गई...ये लास्ट वार्निंग है...
[चटाक्][चिमटी]
...अब तो बहुत हो गया...ले मैं इधर तकिया लगा देता हूँ...
[पापा...देखो बडके ने मेरी जगह में तकिया लगा लिया]
पापा: बेटा बड़के, देखो ऐसा नहीं करते, हटाओ तकिया वहाँ से...और सरको वहाँ से...
[चिमटी][चटाक्][चिमटी]
...पापा, देखो छुटका मुझे तंग कर रहा है...इसे बोलो ना कुछ...
पापा: बेटा बड़के, तुम बड़े हो, ऐसे नहीं रोते...
[चिमटी][चटाक्][चिमटी]
...चल अब तक जो किया सो किया, अब आगे मत करना...वर्ना बहुत बुरा होगा...
[चटाक्][चिमटी][चटाक्][चिमटी]
...
... ...
... ... ...
... ... ... ... (ये तो यूँ ही जारी रहेगा)
नोट: पात्र पहचानने वालों को शानदार इनाम दिये जाने की घोषणा की जायेगी।
...उँ...
[चिमटी]
...ऐ...
[चिमटी]
...ऐ...ऐ...
[चिमटी]
...ओए..अब मत करियो...
[चिमटी]
...अबे...अब करेगा तो देख लेना...
[चिमटी]
...अरे! फ़िर?...अब मत करना...
[चिमटी]
...अब मैं इधर ही देख रहा हूँ, अब कर के दिखा...
[चटाक्]
...अब तो हद हो गई...ये लास्ट वार्निंग है...
[चटाक्][चिमटी]
...अब तो बहुत हो गया...ले मैं इधर तकिया लगा देता हूँ...
[पापा...देखो बडके ने मेरी जगह में तकिया लगा लिया]
पापा: बेटा बड़के, देखो ऐसा नहीं करते, हटाओ तकिया वहाँ से...और सरको वहाँ से...
[चिमटी][चटाक्][चिमटी]
...पापा, देखो छुटका मुझे तंग कर रहा है...इसे बोलो ना कुछ...
पापा: बेटा बड़के, तुम बड़े हो, ऐसे नहीं रोते...
[चिमटी][चटाक्][चिमटी]
...चल अब तक जो किया सो किया, अब आगे मत करना...वर्ना बहुत बुरा होगा...
[चटाक्][चिमटी][चटाक्][चिमटी]
...
... ...
... ... ...
... ... ... ... (ये तो यूँ ही जारी रहेगा)
नोट: पात्र पहचानने वालों को शानदार इनाम दिये जाने की घोषणा की जायेगी।
Wednesday, July 01, 2009
स्वयंवर
तो जनाब आखिरकार शुरु हो ही गया, स्वयंवर, वो भी राखी सावंत का।
मैने दोनो ही एपीसोड देखे हैं, और मुझे तो रुचि जाग रही है। अरे यार, राखी में नहीं, उसके स्वयंवर के कार्यक्रम में। आप लोग भी ना, कुछ भी सोचने लगते हो।
टीवी कार्यक्रम है तो, स्क्रिप्ट भी है ही और डायलाग्स, टेक-रीटेक भी होंगे ही, पर बीच में कभी कभी अचानक ही राखी को शब्द ढुँढते हुये, थोड़ा शर्माते हुए देखना अच्छा लग रहा है।
दूसरे ही एपीसोड में ३ लोगों की रवानगी हो गई। जो गए उन्हे राखी और रवि किशन ने राखी के लिये मुनासिब नहीं समझा।
रवि किशन जी आये थे राखी के भाई की हैसियत से अपने होने वाले बहनोई से कुछ सवाल जवाब करने।
कुछ जवाब तो मजेदार थे - एक ने कहा कि शादी के बाद वो राखी के लिये खाना बनाया करेगा, जब यह पुछा गया कि बनाना आता है तो जवाब आया कि सीख लुंगा। एक ने शादी के बारे में बड़ी अपरिपक्व बात की। उसे लगा शादी जैसा कि सिनेमा में होता है उसी तरह से होती होगी।
एक बात जो मैं ढुँढ रहा था और सुनना चाहता था वो किसी ने नहीं कही। जितने आये हैं, सभी ही राखी से बेइंतहा मोहब्बत करने वाले। कोई भी यह नहीं बोला कि - मैं तो शादी करने आया हूँ, शादी के बाद -हौले हौले से हो जायेगा प्यार सजना....!!
कुछ, जो अच्छे से स्थापित हैं, अपने अपने व्यवसाय में या फ़िर मॉडलिंग, एक्टिंग में उनके तो कुछ चांसेस दिखते हैं, परंतु कई ऐसे भी हैं जो अभी तक नौकरी-व्यवसाय में स्थायित्व से काफ़ी दूर हैं। शायद उनका सोचना हो कि अगर राखी से शादी हो गई तो उनका कैरियर भी सँवर जायेगा। मेरे खयाल से ऐसी सोच में कुछ बुरा नहीं है, जब तक कि आप इमानदार और साफ़ दिल के रहें।
यह स्वयंवर अच्छे से निपटे तो अच्छा है, वर्ना लोगों (प्रतियोगियों) को कीचड़ में उतरते देर नहीं लगती।
अभी तक तो प्रतियोगी (?) होने वाले दुल्हे एक दूसरे के लिये शालीन भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, देखते हैं ऐसा कब तक रह पायेगा।
एक दूसरे के लिये अमर्यादित भाषा, निजी बातों को उजागर करना जिस दिन शुरु हो जायेगा, उस दिन राखी क्या करेगी, पता नहीं।
क्या वो फ़िर भी उनमें से जो अंतिम बचेगा उसी के साथ शादी करेगी?
आपको क्या लगता है?
मैने दोनो ही एपीसोड देखे हैं, और मुझे तो रुचि जाग रही है। अरे यार, राखी में नहीं, उसके स्वयंवर के कार्यक्रम में। आप लोग भी ना, कुछ भी सोचने लगते हो।
टीवी कार्यक्रम है तो, स्क्रिप्ट भी है ही और डायलाग्स, टेक-रीटेक भी होंगे ही, पर बीच में कभी कभी अचानक ही राखी को शब्द ढुँढते हुये, थोड़ा शर्माते हुए देखना अच्छा लग रहा है।
दूसरे ही एपीसोड में ३ लोगों की रवानगी हो गई। जो गए उन्हे राखी और रवि किशन ने राखी के लिये मुनासिब नहीं समझा।
रवि किशन जी आये थे राखी के भाई की हैसियत से अपने होने वाले बहनोई से कुछ सवाल जवाब करने।
कुछ जवाब तो मजेदार थे - एक ने कहा कि शादी के बाद वो राखी के लिये खाना बनाया करेगा, जब यह पुछा गया कि बनाना आता है तो जवाब आया कि सीख लुंगा। एक ने शादी के बारे में बड़ी अपरिपक्व बात की। उसे लगा शादी जैसा कि सिनेमा में होता है उसी तरह से होती होगी।
एक बात जो मैं ढुँढ रहा था और सुनना चाहता था वो किसी ने नहीं कही। जितने आये हैं, सभी ही राखी से बेइंतहा मोहब्बत करने वाले। कोई भी यह नहीं बोला कि - मैं तो शादी करने आया हूँ, शादी के बाद -हौले हौले से हो जायेगा प्यार सजना....!!
कुछ, जो अच्छे से स्थापित हैं, अपने अपने व्यवसाय में या फ़िर मॉडलिंग, एक्टिंग में उनके तो कुछ चांसेस दिखते हैं, परंतु कई ऐसे भी हैं जो अभी तक नौकरी-व्यवसाय में स्थायित्व से काफ़ी दूर हैं। शायद उनका सोचना हो कि अगर राखी से शादी हो गई तो उनका कैरियर भी सँवर जायेगा। मेरे खयाल से ऐसी सोच में कुछ बुरा नहीं है, जब तक कि आप इमानदार और साफ़ दिल के रहें।
यह स्वयंवर अच्छे से निपटे तो अच्छा है, वर्ना लोगों (प्रतियोगियों) को कीचड़ में उतरते देर नहीं लगती।
अभी तक तो प्रतियोगी (?) होने वाले दुल्हे एक दूसरे के लिये शालीन भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, देखते हैं ऐसा कब तक रह पायेगा।
एक दूसरे के लिये अमर्यादित भाषा, निजी बातों को उजागर करना जिस दिन शुरु हो जायेगा, उस दिन राखी क्या करेगी, पता नहीं।
क्या वो फ़िर भी उनमें से जो अंतिम बचेगा उसी के साथ शादी करेगी?
आपको क्या लगता है?
Thursday, June 25, 2009
एक नॉनवेज जोक
एक बार एक हैण्डसम, उँचे कद का हष्टपुष्ट जवान अपनी कार से घुमते हुए एक कस्बे में आ पहुँचा।
वह युवक उस कस्बे के एकमात्र पब-रेस्त्रां में जा पहुँचा।
वहाँ एक टेबल पर बैठने के बाद उसने देखा कि रेस्त्रां में सिर्फ़ महिलाएं ही महिलाएं हैं।
और वह थोड़ा परेशान हो गया क्योंकि सब उसे ही घूर घूर करे देख रहीं थीं।
उसे थोड़ा अजीब लगा। फ़िर उसने वेटर को आवाज़ लगाई। जो वेटर आया उसे देखकर उसकी आँखे फ़टी की फ़टी रह गई।
इतनी बला की खुबसूरत और परफ़ेक्ट फ़िगर वाली लड़की उसने आज तक नहीं देखी थी।
उस युवक से रहा नहीं गया, उसने वेटर से इशारों में ही पुछ लिया कि "यहाँ और क्या मिलेगा?"
वो लड़की अपनी मदभरी चाल से युवक के पास आई, और नीचे झुकी और उसके कानों फ़ुसफ़ुसाई-
:
:
चिकन मसाला
चिकन टिक्का मसाला
चिकन दो प्याज़ा
चिकन हैदराबादी
चिकन पटियाला
चिकन सागवाला
मुर्ग मुस्सलम
बटर चिकन मसाला
चिकन मंचुरियन
चिकन शामीकबाब
तंदूरी चिकन
चिकन टंगड़ी कबाब
चिकन बिरयानी
चिली चिकन
चिकन लालीपॉप
:
:
:
:
इतना ही नहीं, वेटर ने युवक को मटन और फ़िश की भी डिशेज़ बताई।
(सच सच बताना - किस किस के मुँह में पानी आया?)
(अभी खाना खाते खाते ही बनाया हैं)
वह युवक उस कस्बे के एकमात्र पब-रेस्त्रां में जा पहुँचा।
वहाँ एक टेबल पर बैठने के बाद उसने देखा कि रेस्त्रां में सिर्फ़ महिलाएं ही महिलाएं हैं।
और वह थोड़ा परेशान हो गया क्योंकि सब उसे ही घूर घूर करे देख रहीं थीं।
उसे थोड़ा अजीब लगा। फ़िर उसने वेटर को आवाज़ लगाई। जो वेटर आया उसे देखकर उसकी आँखे फ़टी की फ़टी रह गई।
इतनी बला की खुबसूरत और परफ़ेक्ट फ़िगर वाली लड़की उसने आज तक नहीं देखी थी।
उस युवक से रहा नहीं गया, उसने वेटर से इशारों में ही पुछ लिया कि "यहाँ और क्या मिलेगा?"
वो लड़की अपनी मदभरी चाल से युवक के पास आई, और नीचे झुकी और उसके कानों फ़ुसफ़ुसाई-
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चिकन मसाला
चिकन टिक्का मसाला
चिकन दो प्याज़ा
चिकन हैदराबादी
चिकन पटियाला
चिकन सागवाला
मुर्ग मुस्सलम
बटर चिकन मसाला
चिकन मंचुरियन
चिकन शामीकबाब
तंदूरी चिकन
चिकन टंगड़ी कबाब
चिकन बिरयानी
चिली चिकन
चिकन लालीपॉप
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इतना ही नहीं, वेटर ने युवक को मटन और फ़िश की भी डिशेज़ बताई।
(सच सच बताना - किस किस के मुँह में पानी आया?)
(अभी खाना खाते खाते ही बनाया हैं)
Thursday, June 18, 2009
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