Thursday, June 01, 2006

कुछ खास नहीं...

आज कुछ खास नहीं है लिखने के लिये, मगर काफ़ी दिनो से कुछ लिखा नही है तो कुछ अजीब सा लग रहा था.
 
हाँ, ये बात और है कि हम "परिचर्चा" पर बराबर नज़र रखे हुये हैं, और बकायदा, ऑफ़िस में बॉस की नज़र बचा कर परिचर्चा के रनवे पर अपनी (खटारा) गाड़ी दौड़ाते रहते हैं.
 
अरे मिंया, आप इसे कोई आसान काम समझते है क्या? अरे ज़नाब बॉस को इस बात का यकीं दिलाते हुये कि बन्दा जोर-शोर से उनके दिये काम को निभा रहा है, फ़ोरम पर सब लोगों की चर्चा पर नज़र रखना और बकायदा अपनी (जबरजस्ती की) राय देते चलना.
 
और राय भी कैसी, कभी शेर-ओ-शायरी करो, तो कभी कविताएँ लिखो, अब एक नया शगुफ़ा चल पड़ा है - हाइकु - का. तौबा तौबा, बड़ा मुश्किल काम है यार. बची खुची कसर वो "चुटकुले" वाले फ़ोरम ने निकाल दी.
 
कुछ कोड लिखने या कुछ अपने प्रोजेक्ट के बारे में सोचने बैठो तो दिमाग में सारा का सारा हिन्दी साहित्य घुमता रहता है.
 
यही सोचते रह जाते हैं कि -
 
- पंकज भाई ने क्या कहा होगा?
- लवन बागला भाई ने क्या जवाब दिया होगा?
- नाहर जी क्या बोले?
- जीतू भीया के श्रीमुख से क्या वचन निकले होंगे...
इत्यादि इत्यादि.
 
वैसे हमने इस मुश्किल से बाहर निकलने का एक हल सोचा है - हमने जीतू भैय्या को एक "सजेशन" टिकाया कि हमें कुवैत में उनकी ही कंपनी में एक (बहुत) बड़े से पद पर नौकरी दे दी जाय.
 
अब बस, ऑफ़िस के काम धाम तो जीतू भैय्या कर लेंगे (या किसी शेख या मलबारी से करवा लेंगे - ये उनका टेंशन), और अपन?? अपन तो दिन भर बिन्दास कभी ब्लाग, तो कभी टिप्पणी, तो बाकी समय परियों की चर्चा आई मीन - परिचर्चा, करते बैठेंगे.
 
कैसा है सुझाव??
अपने अमूल्य सुझाव देकर मेरे सुझाव को "और" परिष्कृत करने का कष्ट करें.

2 comments:

Nitin Bagla said...

ओ भिया..
मैं "लवेन बागला" नही हूँ....आइ डी को थोडा और तोड कर पढिये..
ये है "love n bagla"...
याने "लव एन बागला"...
याने "लव नितिन बागला"...
याने..आप खुद ही समझ लीजिये... ;)

और हाँ...शादी के बाद किसी को 'परियों की चर्चा' नही करनी चहिये...
:)) :D

अनूप शुक्ला said...

सुझाव यही है कि जीतेंदर के भरोसे मत रहो। ऐसा न हो कि काम तुम्हें करने पड़ें तथा वो सारे वो काम करते रहें जो तुम उनकी छत्रछाया में रह कर करना चाहते हो।