Thursday, June 14, 2007

टूटे गिफ़्ट की पैकिंग

एक किस्सा पढ कर याद आया कि हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो गया था।
 
हुआ ऐसा था कि हमें अपने एक मित्र को किसी एक अवसर पर एक तोहफ़ा देना था.
 
और मित्र हमारा रहता था दूसरे शहर में, सो, गिफ़्ट को कुरियर से ही भेजना बनता था.
 
हमने सोचा, खुब सोचा कि भई क्या दिया जाय, ऐसा क्या दिया जाय कि (ज्यादा) खर्चा भी ना हो और काम भी बन जाये.
 
याने कि सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टुटे, यानि कि हिंग लगे ना फ़िटकरी और रंग भी चोखा आये, यानि कि ....अरे! अब और कितनी मिसालें दे यार, कभी तो "थोड़े को बहुत और खत को तार समझा करो" :)
 
हाँ तो साहब हम गये जुना बाजार, और एक अच्छा (यानि कि सस्ता) -सा एक फ़ुलदान खरीदा. दाम के मामले में भी काफ़ी हुज्जत की गई, अरे भई उसमें थोड़ी सी दरार पड़ी हुई थी ना, सो पुरे पैसे थोड़े ना देने बनते थे. कोई लुट मचा रखी है क्या? बाई द वे, दरार बड़ी हल्की सी थी, और गिफ़्ट में "टिका" सकने के हिसाब से फ़िट ही थी. इतना तो कोई भी यकीं कर लेगा कि कुरियर वालों ने ढंग से "हैण्डल" नहीं किया होगा. (अब इतना तो सोचना ही पड़ता है ना?)
 
हाँ तो साहब, हमने अपना सामान लिया और चले घर कि ओर. मगर अपनी किस्मत भी ना...(अब क्या कहें). घर पहुँचते ही, एक छोटी सी ठोकर लगी और वो फ़ुलदान आ गिरा हमारे पैरों में. सही सलामत गिरा हो - ऐसी अपनी किस्मत कहाँ? २-३ बड़े बड़े टुकड़ों में बँट चुका था उसका संसार.
 
फ़िर हमने सोचा, अरे! ऐसा तो कुरियर वालों के यहाँ भी तो हो सकता था. और क्या फ़रक पड़ता अगर हमारे यहाँ से सही सलामत निकल कर भी अपनी मंज़िल-ए-मसकुद तक पहुँचने से पहले ही तड़क जाता तो?? बस! साहब, इस विचार के आते ही, मन से एक बोझ-सा उतर गया. तो यह तय कर लिया कि (टुटे) फ़ुलदान को अच्छे से "गिफ़्ट रैप" कर के कुरियर कर दिया जायेगा, और बाद में (भोलेपन से) यह कह दिया जायेगा कि -
 
अच्छा खासा सा भेजा था मैने इसे,
हो गया ये टुकड़ा गज़ब हो गया.. 
 
समय बचाने के लिये और "प्रोफ़ेश्नल लुक" देने के लिये हमने इसे बजार से करवाना तय किया. तो हमने टुटे हुये फ़ुलदान को एक दुकान में दिया और कहा कि भई इसे जरा अच्छे से पैक तो कर दो. और हाँ, सलामत फ़ुलदान के माप के डब्बे का बोलना तो हम कतई नहीं भूले (समझदार जो हैं).
 
थोड़ा सा दिमाग और लगाया और दुकानदार को कहा कि - दोस्त जरा अच्छे से पैक कर के रखो हम आते हैं एक चक्कर मार के. और हाँ, पहले रंगीन कागज़ में पैक करना फ़िर डब्बे में. और हम निकल लिये (और यकीन कीजिये, यहीं हमसे गलती हो गई - आज तक यही सोचते हैं कि काश पैक होने तक वहीं बैठे रहते).
 
तो साहब हम थोड़ा बजार घुम कर आये, दुकानदार ने अच्छे से पैकिंग कर रखी थी. सो, डब्बा लिया और कुरियर कर दिया. १- २ दिनों बाद कुरियर मिलते ही हमारे दोस्त का फ़ोन आया. और लगे हमें गालियों से नवाज़ने. मैने पुछा -मित्रा..हुआ क्या है? वो बोला स्साले..शरम नहीं आती टुटा हुआ फ़ुलदान तोहफ़े में भेजता है. हम अड़ लिये, बोले, अरे कहाँ? सही सलामत तो भेजा था. फ़िर अपना तुरुप का पत्ता निकाला - कुरियर में टुट गया होगा यार.
 
मगर बाद में जो खुलासा हुआ (बाकी और जो हुआ वो तो यहाँ लिखने जैसा नहीं है) उससे शिक्षा हमने यह ली कि आईंदा ऐसे सारी खुरापात में आखिरी कील तक हम ही ठोकेंगे, और किसी और पर तो बिल्कुल भरोसा नहीं करेंगे.
 
क्या? क्या कहा? आप जानना चाहते हैं कि क्या हुआ था? अरे वो दुकानदार ने डब्बा तो बिल्कुल माप का लिया था, और रंगीन कागज़ में भी पैक किया था, पर पता है? उसने क्या किया था?
 
"हर टुकड़ा एक अलग अलग कागज़ में पैक कर रखा था"
 

3 comments:

dhurvirodhi said...

बहुत जबर्दस्त, आज तो हंसने के लिये तरस गये थे.

अतुल शर्मा said...

हमने दूसरी सीख भी कि गिफ़्ट अपने सामने पैक करवाएँ।

Shrish said...

एक सीख पंगेबाज के यहाँ ली थी दूसरी आपके यहाँ - आखिरी समय तक गिफ्ट अपने सामने पैक कराएं।