Thursday, February 23, 2006

नामांतरण (सही मायने में नामकरण), हमारे ब्लाग का!

बकौल "काका हाथरसी" -

नाम - काम के मेल का क्या है सामंजस्य,
नाम मिला कुछ और, तो, शक्ल अक्ल कुछ
और!!
कहीं पढा भी था, नाम से ही किसी का व्यक्तित्व झलकता है और उसकी पहचान होती है। सोचिए अगर "ताजमहल" का नाम सिर्फ़ चारमीनार होता तो? "लाल किले" का नाम लाल किला ना होते हुए लाल महल ही होता तो सोचिए किसी के सामने उसका कैसा इम्प्रेशन पड़ता?

किसी भी हाथी का नाम "टिंकू" या "चिंपू" नहीं होता। होता है तो - "जम्बो" टाईप का भारी भरकम नाम। कहने का मतलब यह है कि, हमने भी हमारे "ब्लाग" का नाम कुछ ऐसा रखने का विचार किया जिससे पढ़ने वाले पर उसका कुछ तो असर पडे। वैसे राज़ की बात यह है कि यह कीड़ा हममें जीतू भैय्या ने जगाया। बोले, लिख ही रहे हो तो अपना टाईटल भी अच्छा सा रखो। पहले खराब था - यह उन्होने बड़ी समझदारी से जता दिया। ठीक है भैय्या, बड़े-बुढ़े जो बोले, मान लिया करो। और कोई हो ना हो, कम से कम वो तो खुश रहेंगे आपसे।

तो फ़िर (जोर शोर से) नाम ढुँढा जाने लगा। तुरंत ही एक बात समझ में आ गई कि हम भारतीय, बच्चों के नामकरण के वक्त ज्योतिषों/पण्डितों से क्यों मश्वरा लेते हैं। अरे नाम की खोज करने में आपका "क्राईटिरीया" फ़िल्टर कर देते हैं ना, इसीलिए। भई अगर आपको कोई कह देगा कि सिर्फ़ "क", "त" या "म" से नाम रखना है - तो काम आसान हो गया कि नहीं?

तो भई, जो-जो नाम हमारे मूढ़ मगज़ में आए, वे तो पहले ही से "लोगों" ने चुरा रखे थे। मगर कुलबुलाहट तो हो ही रही थी कि नाम रखना है, नाम रखना है। तभी, मन के किसी कोने से आवाज़ आई - यूरेका - यूरेका!! बगल में छोरा, गली में ढिंढोरा? ब्लाग लिखने की कुलबुलाहट थी तो ब्लाग बनाया, अब नाम रखने की भी कुलबुलाहट!! तो फ़िर कुलबुलाहट ही क्यों ना रख दिया जाय? याने "आम के आम, और गुठलियों के भी दाम"।

हम लिख-लिख कर अपनी कुलबुलाहट निकालते रहेंगे, और पढने वाले ये सोच कर कुलबुलाते रहेंगे कि "या ईलाही, हम ना हुये"!! उन्हे ये नाम क्यों ना सुझा?

हाँ जी, और आखिरी खबर मिलने तक -ब्लाग्स के नाम पर अभी तक "कापीराईट" वगैरह का ठप्पा नहीं लगा जो कोई हमारी तरफ़ टेढी नज़रो से देखे कि ये तो हम सोच रहे थे, या, ये तो हमारा नाम है, तुमने कैसे रख लिया? अगर ऐसा है तो हमें "कारण बताओ" नोटिस ना दिया जाय। सिर्फ़ एक इ-पत्र या एक टिप्पणी प्रेषित करना ही काफ़ी होगा, और हम "माण्ड्वली" कर लेंगे। याने कि या तो आपको शीशे में उतार लेंगे या पटा लेंगे या डरा धमका लेंगे या फ़िर ऐडा बन के पेडा खा लेंगे। और आपको कुलबुलाने पर मजबूर कर देंगे। :)

1 comment:

Tarun said...

Accha likhe ho vijay...office ke dept. ke chakkar abhi bhi lag rahi hain ya thum gaye hain....