Friday, February 24, 2006

क्या ईश्वर है?

बात बहुत छोटी है, और, पता नहीं जो मैं बता रहा हूँ वह कितनो को सच लगेगी और कितनो को समझ आयेगी। पर फ़िर भी, मन में बात आई है और लोगों तक पहुँचाने का माध्यम भी सहजता से उपलब्ध है तो कह देना ही बेहतर होगा।

मैं खुद को न आस्तिक कहता हूँ और ना ही नास्तिक। आस्तिक इसलिए नहीं क्योंकि मुझे "भगवान" को मनाने का तरीका नहीं पसन्द। मुझे कभी नहीं लगा कि "भगवान" पुजा करने से, आरती करने से, प्रसाद चढाने से या फ़िर मुर्ति के सामने आँख बन्द कर हाथ जोड कर खडे रह कर मन्त्रादि का जाप करने से आपकी बात सुन ही लेते हैं। नास्तिक इसलिए नहीं क्योंकि मुझे लगता है कि कोई तो शक्ति कहीं ना कहीं जरुर है जो "सब देखती है", "सब कंट्रोल करती है"। और फ़िर बात आस्था की भी होती है। हम विश्वास करते हैं कि सब कुछ बिगड़ने पर भी "कोई" तो है जो हमारी रक्षा करेगा। कब करेगा, कैसे करेगा यह कोई नहीं जानता। और शायद जान भी नहीं पाएगा।

यहाँ मैं यह भी कहुँगा कि अगर मैं आस्तिक हूँ तो किसी एक धर्म विशेष के लिए नहीं। यह मेरी आस्था है जो मुझे किसी मंदिर में भी वही महसूस करवाती है जो किसी मस्जिद के सामने से निकलने पर महसूस होती है। अगर मैं मंदिर में बिना हाथ जोडे भी खड़ा हूँ तो हो सकता है कि मैं उस "अज्ञात शक्ति" से कुछ अपने मन की बात कह रहा हूँ, कुछ "अच्छा" करने की सिफ़ारिश कर रहा हो सकता हूँ। मगर किसी मंत्र का जाप करने का विचार तक नहीं आता। वैसे यह एक बहुत ही सामान्य सा व्यहार है इंसान का कि - अपना बोझ अपने से बड़े के उपर डाल के खुद को बड़ा मुक्त सा समझता है, शांति पाता है। शायद यही आस्था है।

मैं एक वाकया बताना चाहुँगा जो किसी के लिए तो "चमत्कार" हो सकता है, पर किसी के लिए मात्र एक "संयोग"। अभी कुछ दिनों पहले मैं काफ़ी परेशान था। कारण, मेरा मोबाईल चोरी हो गया था। मोबाईल, वह भी पहला-पहला, हालांकि साल भर इस्तेमाल कर चुका था, मगर, मेहनत की कमाई के 5 रू भी जाया होते हैं तो दुःख होता है। मुझे तो होता है। मगर फ़िर भी, मोबाईल का इतना दुख नही था जितना उसमें स्टोर किये हुए डाटा का। किसी और के लिए भले ही वह काम का ना हो, मेरे लिये तो था। तो मैं दुखी था अपने डाटा के लिये। कुछ समझ नही आ रहा था। पुलिस अपना काम उनकी ही गति से कर रही थी। उम्मीद न के बराबर थी। और फ़िर वही याद आये- जिन्हें हम भगवान कहते हैं। मंदिर गया, "भगवान" से कुछ बातें की, मन थोड़ा शांत हुआ। खुद को समझाया कि अपनी ही किसी "action" की यह "reaction" है। घर पर पहले ही "गणेशजी" और "लक्ष्मीजी" की फ़ोटो लगा रखी थी। घर आकर सोच रहा था कि- ऐसे मामलो में "हनुमानजी" की ज्यादा धाक होती है, काश, मेरे पास उनकी भी कोई तस्वीर होती। अगले दिन जब आफ़िस जाने के लिए निकला तब भी यही बात मन में थी कि "बजरंगबली" को भी अपने घर ले आते हैं। यही सोचते सोचते मैं अपने बस स्टाप तक आ गया। पता नहीं क्या सोचा और बस स्टाप के बजाय स्टाप के पहले ट्राफ़िक सिग्नल के पास ही खड़ा रह गया। शायद यह सोचा होगा कि, सिग्नल पर बस रुकेगी तो वहीं से सवार हो जाऊंगा। फ़ुटपाथ पर ही इंतज़ार करने लगा। 5 मिनिट एक ही जगह खड़े रहने के बाद मैं स्वाभाविक रुप से चहलकदमी करते हुए थोडी दूर गया और एक पेड़ से टिक कर खड़ा हो गया। कुछ ही क्षणों पश्चात् अचानक ही मेरी नज़र जमीन पर पड़ी जहाँ एक छोटी सी तस्वीर पड़ी हुई दिख रही थी। थोड़ा गौर से देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। देखने से लग रहा था कि कोई पाकेट कैलेण्डर है। सोचा कि कैसे लोग होते हैं, जो पिछले साल का कैलेण्डर फ़ैकते समय यह भी नही देखते कि क्या फ़ैक रहे हैं। "तिरंगा" तो बहुधा दिखता है हर 26 जनवरी या 15 अगस्त के बाद, "भगवान" की तस्वीर के भी वही हाल दिखे। मुझसे तो रहा नही गया, उठा ही ली। देखा तो जाना वह "बजरंगबली" की ही तस्वीर थी। मन में काफ़ी विचार आए, यूँ भगवान की तस्वीर मिलना, वह भी तब जब वही इच्छा थी, मगर विश्लेषण नहीं कर सका। कहने की जरुरत नहीं कि तब से वह तस्वीर मेरे पास है।

इस तरह "बजरंगबली" का मेरे पास आना (अब इसे तो मैं खुद चल कर आना ही कहुँगा) सिर्फ़ एक संयोग मात्र था या कुछ और, मैं किसी निश्कर्श तक नहीं पहुँच सका। शायद कोई इसे समझा सके।

मैंने यह कभी नही सोचा था कि किसी ऐसे विषय पर कुछ लिखुंगा, किंतु बात हुई ही कुछ ऐसी है कि लिखे बिना रहा भी नहीं गया। फ़िलहाल तो मन को कुछ शांति मिली है।

3 comments:

Raman Kaul said...

विजय जी, क्यों उधेड़बुन में पड़े हैं? स्वयं को पूर्ण रूप से आस्तिकों में गिनिये। आस्तिक होना कोई बुरी बात नहीं है। लोगों द्वारा भगवान को मनाने का "तरीका" पसन्द नहीं होने से आप की आस्तिकता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मेरे विचार में भगवान या किसी वाह्य शक्ति को मानने भर से आदमी आस्तिक हो जाता है। और यदि उस से मन में शान्ति मिले तो उससे अच्छा क्या है? जहाँ तक चमत्कार की बात है, मैं सोच रहा था आप को उस पेड़ के नीचे अपना खोया हुआ मोबाइल मिल जाएगा। :-)

Jitendra Chaudhary said...

विजय भाई, आपका अनुभव पढकर अच्छा लगा। मेरी गिनती भी कुछ आप जैसे लोगों मे ही होती है,मै पूजा पाठ मे यकीन नही रखता, लेकिन ये जरुर मानता हूँ कोई शक्ति तो है,जो हम सभी के साथ है।अब वो क्या है उसके डीप मे मैं नही जाना चाहता।

मन को जहाँ शान्ति मिले, वही ईश्वर का घर है, ये मन्दिर मस्जित,गिरजे और गुरद्वारे तो हम इन्सानों ने ही बनाये है, वो शक्ति तो एक ही है, कोई अलग अलग रुप थोड़े ही है,जिसने उसको जिस रुप मे देखा/जाना, वैसे पूजना शुरु कर दिया।

संजय बेंगाणी said...

मेरे बारे में लोग मुझे नास्तिक कहते तो शायद मैं नास्तिक ही हूं, और नास्तिक होना बुरा नहीं हैं क्योकि नास्तिक होने से आदमी अधर्मी नहीं हो जाता. ऋषि चावार्क भी नास्तिक थे. रही बात चमत्कारों कि तो मित्र आपके किस्से से भी बडे बाकिये देखे हैं पर हमारी अपनी विचारधारा से मन कभी नहीं डिगा. अगर देवता चमत्कार करते तो उनको पूजने वाले हिन्दूओं का क्यो शताब्दियों तक दमन होता रहा. स्वयं देवताओं की मुर्तियों के सर कलम कर मन्दीर ध्वस्त किये गये थे. इनमे सोमनाथ तो प्रसिद्ध हैं, बाकि सेंकङो हैं.
अंत मे कामना करता हूं कि आपका खोया 'घुमतू' (मोबाइल) आपको मिल जाये.