Sunday, April 05, 2009

एक दीवाना नेट पे...

एक दीवाना नेट पे,
वर्डप्रेस पे या ब्लागर पे,
लिखने का बहाना ढुंढता है, छपने का बहाना ढुंढता है।
एक दीवाना...

इस हिन्दी ब्लागिंग की दुनियाँ में अपना भी कोई ब्लाग होगा,
अपने पोस्टों पर होंगी टिप्पणियाँ, टिप्पणियों पे अपना नाम होगा,
देवनागरी के यूनिकोड फ़ोण्टों में....
देवनागरी या देवनगरी...?
देवनागरी के यूनिकोड फ़ोण्टों में लिखने का जतन वो ढुंढता है,
ढुंढता है,
लिखने का बहाना ढुंढता है, छपने का बहाना ढुंढता है।
एक दीवाना...

एक दीवाना नेट पे,
वर्डप्रेस पे या ब्लागर पे,
लिखने का बहाना ढुंढता है, छपने का बहाना ढुंढता है।
एक दीवाना...

जब सारे हिन्दी में...
सारे? और हिन्दी में?
जब सारे हिन्दी में लिखते हैं,
सारा नेट हिन्दी हो जाता है,
सिर्फ़ इक बार नहीं फ़िर वो लिखता,
हर बार लिखता जाता है,
पल भर के लिये...
पल भर के लिये...
पल भर के लिये किसी ब्लागिंग का अवार्ड भी जीतना चाहता है,
चाहता है,
लिखने का बहाना ढुंढता है, छपने का बहाना ढुंढता है।
एक दीवाना...

एक दीवाना नेट पे,
वर्डप्रेस पे या ब्लागर पे,
लिखने का बहाना ढुंढता है, छपने का बहाना ढुंढता है।
एक दीवाना...

7 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया पैरोडी लिखी है।एक अकेला इस शहर मे..शायद यही गीत की लय को पकड़ यह रचना लिखी गई है।बहुत अच्छी लगी।बधाई\

संगीता पुरी said...

वाह !! बहुत खूब !!

विजय वडनेरे said...

परमजीत जी: सही पहचाना। यही गीत पकड़ा है।

शुक्रिया। :)

सागर नाहर said...

मस्त पैरोडी बनाई विजय भाई।

:)

prabhakar said...

काश अपना भी कोई बहाना होता..............

विजय वडनेरे said...

प्रभाकरजी: आप तो बस्स लिख दो जी, बहाने का क्या है, वो तो बाद में भी बनाया जा सकता है। :)

दर्पण साह "दर्शन" said...

badhiya...